Moral stories for kids in Hindi | Fairytales in Hindi | Short moral stories | नैतिक शिक्षा | बच्चों के लिए हिंदी में कहानियां

सोने की चिड़ियाँ

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एक बार ढोलकपुर जंगल में कू-कू कोयल बहुत ही मीठा गाना गा रही थी। मैं हूँ कू-कू कोयल।  गाती हूँ सुंदर मीठा-मीठा गाना। तुम सब भी सुनकर आ जाना, आ जाना आ जाना। उसकी आवाज दूर-दूर तक सबको सुनाई दे रही थी। तभी उसकी आवाज सुन कर एक जादूगर वहाँ आता है, और उससे कहता है। वाह, कू-कू कोयल तुम्हारी आवाज तो बहुत मीठी है। बिल्कुल खरा सोना है। सोना.. हाँ । तभी जादूगर आबरा-का डाबरा बोलता और कू-कू कोयल से कहता है, तुमअब से जब भी गाना गाओगी और गाते समय अगर तुम्हारे मुंह से एक भी बूँद पानी की नीचे गिर गई तो वो बूंद सोने में बदल जाएगी, लेकिन तुम्हें एक बात का हमेशा ख्याल रखना होगा कि तुम कभी ऐसे लोगों के सामने नहीं गाना जो तुमको किसी भी तरह से नुकसान पहुचाएं।

ऐसा बोलने के बाद जादूगर वहाँ से चला जाता है। इधर कू-कू कोयल फिर से गाना गाने लगती है। तभी वहाँ पर चम्पा लोमड़ी आती है और वो कू-कू कोयल का गाना सुनने लगती है। गाना गाते-गाते कू-कू कोयल के मुहँ से पानी गिरता है। पानी के नीचे गिरते ही वो सोने में बदल जाता है। चम्पा लोमड़ी अपने सामने सोना देख कर बहुत खुश हो जाती है और झट से सोना उठाती है फिर वहाँ से बहुत तेज दौड़ लगाते हुए अपने घर पहुँचती है। इधर कू-कू कोयल गाना गाती रहती है। तभी वहाँ पर एक शिकारी आता है। शिकारी पेड़ के नीचे बैठकर कू-कू कोयल का गाना सुनने लगता है। कू-कू कोयल गाना गा ही रही थी कि फिर से उसके मुहँ से पानी नीचे गिरता है। मुहँ का पानी नीचे पहुंचते ही सोने में बदल जाता है। अपने सामने शिकारी सोना देख कर बहुत खुश हो जाता है। वो झट से उसे उठा लेता है। तभी शिकारी फिर देखता है कि ऊपर से पानी की एक ओर बूंद गिरी जो सोने में बदल गई। शिकारी फिर खुश होता है और उसे भी अपने पास रख लेता है। ऐसे करते हुए कई बूंदे ऊपर से नीचे गिरती है जो सोने में बदलती जाती है। शिकारी मन में सोचता कि शायद आसमान से सोने की बारिश हो रही है और ये सोचते हुए वो एक-एक कर के सोना उठाता जाता है। तभी शिकारी कि नजर गाना गा रही कू-कू कोयल पर जाती है। और वो देखता है कि ये सोने वाला पानी तो कू-कू कोयल के मुहँ से निकल रहा। फिर वो बिना देरी किये कोयल को पकड़ने के बारे में सोचता है क्योंकि कू-कू कोयल को पकड़ कर वो बन जाएगा अब बहुत-बहुत अमीर। इधर कू-कू कोयल गाना गाने में इतना खो जाती है कि उसे इस बात का भी ध्यान नहीं रहता कि उसके आस-पास कौन है। फिर शिकारी बहुत धीरे से अपना जाल फेकता है और कू-कू कोयल को पकड़ लेता है। जाल में फँसते ही कू-कू कोयल कहती है धत-तेरी कि ये क्या कर बैठी मैं। जादूगर ने कहा भी था मुझसे कि आपने आस-पास के लोगों से बच कर रहना। अब देखो मैंने अपनी लापरवाही के चक्कर में क्या कर लिया। जाल में फंस गई।

 

इधर कू-कू कोयल को ले जाते हुए शिकारी अपने मन में सोचता है कि क्यों न इस कोयल को राजा को ही दे दूँ। अगर राजा को दे दिया तो राजा इसके बदले मुझे राजमहल में रहने देंगे। फिर पूरी ज़िंदगी आराम से बीतेगी मेरी। हाँ यही सही रहेगा। ऐसा सोचते हुए शिकारी राजा के पास पहुंचता है और उसे सारी बात बताता है। राजा कोयल को लेने और उसके बदले शिकारी को अपने राज्य महल में रहने देने की बात मान जाता है। तभी वहाँ पर राजा का मंत्री आता है और उससे बोलता है कि महाराज, ये शिकारी झूठ बोल रहा। आपने कभी सुना या देखा भी है क्या किसी चिड़ियाँ के मुहँ से सोना निकले। भई मैंने तो नहीं देखा। मंत्री कि बात सुन कर राजा शिकारी से कहता है कि पहले मुझे सोना दिखाओ। आखिर ये कोयल कैसे सोना निकालती है। मैं भी तो देखूँ। राजा की बात सुन कर शिकारी कोयल से गाना गाने को कहता है। लेकिन कोयल तो इस बार कोई गलती नहीं करना चाहती थी, इसलिए वो अपना मुहँ ही नहीं खोलती। शिकारी के बहुत बार कहने पर भी जब कोयल गाना नहीं गाती तब राजा को ये सब देख कर गुस्सा आ जाता है और वो अपने सिपाहियों से कह कर कोयल को जाल से निकाल देता है और शिकारी को पकड़ लेता है। जाल से निकलते ही कोयल गाना गाना शुरू करती है ..कू-कू मैं हूँ कू-कू कोयल गाती हूँ मीठा-मीठा सुंदर गाना, जिसे सुनकर तुम सब मेरे पास और फिर तभी उसके मुहँ से फिर से पानी नीचे गिरता है जो सोने में बदल जाता है। राजा ये सब बस देखता ही रह जाता है और अपने सिपाहियों से कोयल को पकड़ने को कहता है। लेकिन इस बार कू-कू कोयल पहले जैसी कोई भी गलती नहीं करती है और वहाँ से उड़ती हुई सीधे ढोलकपुर जंगल पहुँचती है।    

मोरल- इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा अपने बड़ों की बात माननी चाहिए, साथ ही हमेशा सतर्क भी रहना चाहिए।   

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बुरे काम का बुरा नतीजा

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हर बार पड़ने वाली ठंड से इस बार की ठंड कहीं ज्यादा थी। पूरा ढोलकपुर जंगल ठंड से परेशान था। गज्जू हाथी, कू-कू कोयल, ब्लैकी कौआ, चंपू गधा, मोंटी बंदर और चम्पा लोमड़ी सब बस एक बढ़िया गरमा-गरम  घर बनाने में लगे थे। और फिर एक दिन चीकू खरगोश का घर बन कर तैयार हो जाता है। वो उसमे खुशी-खुशी रहने लगता है। तभी एक दिन चम्पा लोमड़ी वहाँ आती है और वो बहुत दुखी होकर चीकू खरगोश से कहती है, अरे चीकू खरगोश, तुम तो बहुत समझदार निकले। ठंड से बचने के लिए तुमने कितना बढ़िया घर बनाया है। अब क्या बताऊँ चीकू खरोगोश ठंड इतनी पड़ रही की मुझसे तो अब चाह कर भी अपना घर नहीं बना पा रहा । तो क्या चीकू खरगोश कुछ दिनों के लिए तुम मुझे अपने साथ रख सकते हो। मैं तुम्हें बढ़ियाँ-बढ़ियाँ खाना बना कर खिलाऊँगी।

 

चीकू खरगोश उसकी बात मान जाता है और उसे अपने साथ अपने घर में रहने देता है। पहले तो चम्पा लोमड़ी कुछ दिन उसके घर में अच्छे से रहती है फिर उसे एक चालाकी आती है। वो सोचती है क्यूँ न चीकू खरोगोश को यहाँ से निकाल दूँ। इतनी ठंड में उसके लिए भी खाना बनाना पड़ता है। बस यही सोचते हुए चम्पा लोमड़ी चीकू खरगोश को उसके ही घर से निकाल देती है। चीकू खरगोश उसको खूब मनाता है, अरे चम्पा इतनी ठंड में मैं कहाँ जाऊंगा। लेकिन फिर भी चम्पा उसकी बात नहीं मानती। दुखी होकर चीकू खरगोश को अपने घर से निकलना ही पड़ता है। तभी चीकू खरगोश मोंटी बंदर के पास जाता है और उसे चम्पा के बारे में सब कुछ बताता है। और उससे कहता है कि वो उसके साथ चले और चम्पा को घर से बाहर निकाले।

 

चीकू खरगोश को लेकर मोंटी बंदर चम्पा लोमड़ी के पास जाता और उस पर गुस्सा करते हुए उसे बाहर निकलने को कहता है। तभी चम्पा लोमड़ी मोंटी बंदर को धीरे से अपने पास बुलाती है और उसके कान में कहती है, अरे मोंटी बंदर तुम यहाँ रह सकते हो। इतना गरम घर देख कर मोंटी बंदर चम्पा लोमड़ी कि बात मान जाता है और फिर दोनों मिल कर चीकू खरगोश को फिर बाहर निकाल देते हैं। अब चीकू खरगोश ब्लैकी कौए के पास जाता है, उसे पूरी बात बताता है। मोंटी बंदर की तरह ब्लैकी कौआ भी चम्पा लोमड़ी के पास जाता है और चीकू खरगोश को उसके ही घर से निकालने के लिए उस पर गुस्सा करने लगता है। फिर चम्पा लोमड़ी ब्लैकी कौए को भी अपने साथ रहने को कहती है। मोंटी बंदर के साथ-साथ अब ब्लैकी कौआ भी उन लोगों के साथ रहने लगता है। ये सब देख कर चीकू खरगोश को अब कुछ समझ नहीं आ रहा था। जिसको भी ले कर आ रहा था वो सब चम्पा के साथ उसी के घर में रहने लग जा रहे थे। तभी चीकू खरगोश को गज्जू हाथी का खयाल आता है। क्योंकि पूरे ढोलकपुर जंगल में अगर कोई समझदार है तो वो है गज्जू हाथी। बस यही सोचते हुए चीकू खरगोश ठंड में कंपकपाते हुए गज्जू हाथी के पास पहुँच कर उसे सारी बात बताता है। पर अंदर ही अंदर चीकू खरगोश डरता भी रहता है कहीं ऐसा न हो मोंटी बंदर और ब्लैकी कौए की तरह यह भी चम्पा लोमड़ी की बात में आ जाए और उसके साथ रहने लगे।

चीकू खरगोश गज्जू हाथी के बारे में ऐसा सोच ही रहा था कि तभी उसे चम्पा लोमड़ी की आवाज सुनाई देती है, अरे गज्जू दादा आओ। इन सब की तरह तुम भी अब इस घर में रह सकते हो। और हाँ मैंने आज गाजर का हलवभी बनाया है॥ चलिए अंदर अभी आपको खिलाती हूँ। और फिर जैसे ही गज्जू हाथी चीकू खरगोश के घर के अंदर जाता है उसका घर टूट जाता है। सभी टूटे घर से तुरंत बाहर निकलते है और जोर-जोर से चिल्लाने लगते हैं, अरे गज्जू दादा ये क्या किया तुमने। इतनी ठंड में हम सब कहाँ रहेंगे। इतना गरम घर क्यों तोड़ा। तभी गज्जू हाथी उनसे कहता है क्यों ठंड क्या सिर्फ तुम्हारे लिए है। चीकू खरगोश के लिए। तुम सब ने एक बार भी चीकू के बारे में नहीं सोचा। चलो चीकू खरगोश जब तक तुम अपना नया घर नहीं बना लेते तब तक तुम मेरे साथ मेरे घर में रह सकते हो और हाँ चीकू खरगोश एक बात ओर ध्यान रखना अब से किसी की बातों में आने से पहले उसका अच्छा बुरा जरूर सोच लेना। समझे।

मोरल- हमें कभी भी किसी के साथ बुरा नहीं करना चाहिए। क्योंकि बुरे काम का नतीजा हमेशा बुरा ही होता है।  

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कीचू कछुए की उसकी बहन से हुई लड़ाई

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एक बार ढोलकपुर जंगल में कीचू कछुआ उदा स होकर बैठा हुआ था। तभी वहाँ पर गज्जू हाथी आया और उसने कीचू कछुए से पूछा, कीचू कछुए क्या हुआ तुम्हें। तुम यहाँ अकेले उदास होकर क्यों बैठे हो। गज्जू हाथी को देख कीचू कछुआ बोला, अरे गज्जू दादा क्या बताऊँ, बहुत दुखी हूँ मैं। हर समय बस मुझे मेरी माँ से डांट पड़ती रहती है। आप तो मेरी छोटी बहन कीची को जानते ही हैं। हर समय लड़ती रहती है। पहले तो मेरा सामान लेती है उसके बाद मुझे मेरे ही सामान के साथ खेलने नहीं देती है। अगर मैं ज्यादा देर टीवी देख लूँ तो सीधे जाकर माँ को शिकायत कर देती है। माँ भी उसी की बात मानती हैं और टीवी बंदकर मुझे पढ़ने के लिए कहती हैं। आज जब उसने मेरा फिर से सामान लिया तो मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उसे बहुत जोर से थप्पड़ मार दिया।  और फिर बस करो, कीचू कछुए अब मैं समझ गया कि तुम आखिर दुखी होकर यहाँ क्यों बैठे हो। तुमने अपनी बहन को मारा इस वजह से तुम्हें अपनी माँ से मार पड़ी और तुम अब यहाँ॥ हाँ तो कीचू कछुए मैं तो तुमको यही बोलूँगा कि तुम बड़े हो, समझदार हो। तुम्हें अपनी बहन के साथ अच्छे से रहना चाहिए। उसे प्यार करना चाहिए। एक बात हमेशा याद रखना कीचू कछुए, चाहे हम जितना भी लड़ लें अपने भाई-बहन से लेकिन हमारे मुश्किल समय में सबसे पहले यहीं हमें बचाते हैं। इतना कह कर गज्जू हाथी वहाँ से चला जाता है।

इधर कीचू कछुआ अपना मुहँ फुलाते हुए घर के लिए निकलता है। तभी सामने से आ रही चम्पा लोमड़ी कीचू कछुए को खाने के लिए दौड़ती है, लेकिन कीचू कछुआ उसे देख नहीं पता क्योंकि वो तो गुस्से में अपने घर जा रहा था। लेकिन तभी कीचू कछुए कि बहन वहाँ पहुँच जाती है और जोर-जोर से चिल्लाती है भाई-भाई जल्दी वहाँ से हटो। देखो तुम्हारे सामने चम्पा लोमड़ी आ रही है तुम्हें पकड़ने। अपनी छोटी बहन कि आवाज सुन कर कीचू कछुआ जल्दी-जल्दी भागने लगता है और फिर एक पेड़ के अंदर जाकर छिप जाता है। जब बहुत देर हो जाती है और कीचू कछुआ पेड़ से बाहर नहीं आता है तो चम्पा लोमड़ी वहाँ से चली जाती है। चम्पा लोमड़ी के जाते ही कीचू कछुआ वहाँ से निकलता है और सीधे अपने घर पहुंचता  है। घर जाकर अपनी छोटी बहन को गले लगाता है और उससे कहता है मुझे माफ कर दो। आज तुमने मुझे बचा लिया। गज्जू हाथी ने बिल्कुल सही कहा था। मुसीबत के समय हमारे अपने ही हमें बचाते हैं। आज से मैं तुमसे वायदा करता हूँ कि अब मैं कभी भी तुमसे नहीं लड़ूँगा। तुमको खूब प्यार से रखूँगा। कीचू कछुए की बात सुन कर उसकी बहन कहती है, अच्छा तो फिर तुम्हारा सबसे प्यारा खिलौना मैं ले सकती हूँ क्या। इसके बाद दोनों भाई-बहन मिल कर जोर-जोर से हंसने लगते हैं।

मोरल- हमें आपस में कभी नहीं लड़ना चाहिए। हमेशा मिल-जुल कर रहना चाहिए।       

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माँ की डांट 

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ढोलकपुर जंगल में रुस्तम शेर अपने दोनों बच्चों चीका और मीका को बहुत देर से समझाने में लगा था, अरे मेरे प्यारे बच्चों चीका और मीका माँ की बातों का बुरा नहीं मानते। माँ जो भी बोलती है तुम्हारे भले के लिए बोलती है। माँ की बातों को माना करो मेरे लाल चीका और मेरे पीले मीका॥

रुस्तम शेर के समझाने पर चीका पहले बोलता है, नहीं मुझे नहीं मानना। जब देखो तब माँ कुछ न कुछ बोला ही करती है। चीका अपने पापा रुस्तम शेर को बता ही रहा था कि तभी झट से मीका बोलता है, हाँ, हाँ पापा भाई बिल्कुल सही कह रहा है, माँ के पास हमें डांटने के अलावा और कोई काम ही नहीं है। खाना देर से खाओ तो डांट, टीवी ज्यादा देर देखो तो डांट, पढ़ाई न करो तो डांट, खिलौना तोड़ दो तो डांट॥ डांट डांट और सिर्फ डांट। अब हम गुस्सा है और किसी से भी बात नहीं करेंगे, न खेलेंगे और न ही पढ़ेंगे।

दोनों की बात सुन कर रुस्तम शेर बोलता है, ठीक है तुम्हें किसी से बात नहीं करनी तो मत करो, अच्छा ये बताओ तुम सब को गज्जू हाथी कैसा लगता है। तभी चीका बोलता है, कौन अपने गज्जू दादा। वो तो बहुत अच्छे हैं। बहुत समझदार भी। उनसे बात करना और उनके साथ खेलना बहुत अच्छा लगता है। और हाँ वो पढ़ाते भी बहुत अच्छा हैं। झट से मीका बोलता है।

तभी रुस्तम शेर फिर बोलता है, अच्छा मोंटी बंदर कैसा लगता है। मोंटी बंदर वो तो बहुत शैतान है। जब देखो तब सबको परेशान करते रहते हैं। मैं एक दिन बैठकर जूस पी रहा था और वो चुपके से पीछे से आए और मेरा जूस ले लिया। हाँ-हाँ पापा मेरे साथ भी मोंटी बंदर ने ऐसा ही किया था। आप जो एक बार दूसरे जंगल गए थे न घूमने और वहाँ से मेरे लिए बढ़िया सा चश्मा लेकर आए थे। वो चश्मा भी मोंटी बंदर ने ले लिया था। बहुत खराब है मोंटी बंदर। दोनों एक साथ बोलते हैं।

तभी रुस्तम शेर मन ही मन मुसकुराता है और कहता है तुम्हारी माँ भी तुम्हें इसीलिए डांटती हैं ताकि बड़े होकर तुम दोनों गज्जू हाथी की तरह समझदार बनो, न कि मोंटी बंदर कि तरह।

रुस्तम शेर की ये बात दोनों चीका और मीका ध्यान से सुन ही रहे थे कि तभी रूपा शेरनी वहाँ आती है गरमागरम रसगुल्ला लेकर। दोनों बच्चे झट से उठते हैं और माँ के गले लगते हुए कहते है, माँ हमे माफ कर दो। हमे नहीं बनना मोंटी बंदर की तरह। आज से हम दोनों आपकी सारी बाते मानेंगे। फिर रूपा शेरनी दोनों बच्चों को खूब प्यार करती है और फिर सब मिल कर गरमा-गरम रसगुल्ला खाते हैं।

मोरल- अगर कभी भी आपके बड़े आपको समझाए कुछ बोले तो उनकी बातों को मानना चाहिए। क्योंकि बड़े हमेशा हमारी भलाई के लिए ही ऐसा करते है ताकि हम बन सकें पूरी दुनिया के सबसे अच्छे बच्चे।  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

एक बार ढोलकपुर जंगल में शीरो नाम का एक साँप रहता था। शीरो साँप बहुत छोटा और दुबला-पतला था। उसके दोस्त उसे हवा-हवा कह कर चिढ़ाते रहते थे। दोस्तों का चिढ़ाना शीरो को खराब तो बहुत लगता, लेकिन वो उनका कुछ कर भी नहीं सकता था। क्योंकि शीरो था बहुत दुबला और पतला। तभी शीरो ने अपने मन में ठाना कि अब वो खूब खाएगा। और तब तक खाता रहेगा जब तक मोटा-तगड़ा न हो जाए। बस यही सोच कर शीरो खाना खाना शुरू करता है। उसे खाने में जो भी मिलता वो बिना किसी न-नुकुर के उसे खा लेता। अब शीरो को खाना इतना पसंद आने लगा कि वो अब जिसके पास भी खाना देखता तो उसे डरा कर उसका खाना ले लेता फिर उसे खुशी-खुशी खाता।

 

इस तरह से खूब खाना खा-खा कर अब शीरो धीरे-धीरे मोटा होने लगा। अब शीरो जब भी अपने दोस्तों के पास जाता तो उसके दोस्त उसे देखते ही वहाँ से जोर से भागते। अब उसके दोस्तों को शीरो से डर लगने लगा था। क्योंकि एक दिन जब शीरो अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था तब खेल-खेल में शेरो की अपने दोस्तों से लड़ाई हुई फिर शीरो साँप ने उन्हें ऐसे डराया कि कोई भी उसके आस-पास नहीं दिखा। ये सब देख कर शीरो को बहुत खुशी हुई। वो अब खुद को बहुत ताकतवर समझने लगा। अब शीरो इस बात का फायदा उठाने लगा। वो अब जिसके पास भी खाना देखता तो उसको अपनी ताकत से डराता और उससे खाना ले लेता। इस तरह से दूसरों पर अपनी ताकत का डर दिखा-दिखा कर और उनका खाना खा खा कर अब शीरो हो गया था बहुत मोटा। इतना मोटा कि अब वो अपने घर के अंदर भी नहीं जा पा रहा था। फिर शीरो ने सोचा क्यों न नया घर बनाया जाए। लेकिन इतनी मेहनत करे कौन। अब तो पूरे ढोलकपुर के जानवर मुझसे डरते है। चलो उन्हीं मे से किसी को डरा कर उनका घर ले लेता हूँ। और फिर ये सोचते हुए शीरो नए घर कि तलाश के लिए निकलता है।

 

सबसे पहले वो मोंटी बंदर के घर जाता है। मोंटी बंदर शीरो साँप को अपने सामने देख कर डर जाता है और डरते हुए उससे पूछता है, क्या हुआ शीरो भाई, यहाँ क्यों आए हो। तभी शीरो बोलता है, तुम जाओ यहाँ से। आज से ये मेरा घर है। अब मैं  इसमे रहूँगा। शीरो कि बात सुन कर मोंटी बंदर तुरंत अपना सामान लेता है और कहता है, अरे शीरो भाई आज से ये आपका ही घर है। ऐसा कहते हुए वहाँ से निकलता है और खुद से मोंटी बंदर कहता है भैया कौन उलझे इनसे। जान बची लाखों पाए। जाता हूँ और बढ़ियाँ से घर बनाता हूँ। इधर शीरो मोंटी बंदर के घर जाते ही तुरंत बाहर निकलते हुए बोलत है, अरे-मोंटी बंदरक घर है तो बड़ा, लेकिन खाने का कुछ भी नहीं है इसके पास। फिर शीरो कोई दूसरा घर देखने लगता है। तभी उसे सोना चींटी का घर दिखाई देता है।

 

शीरो सांप उसके घर जाता है और उससे कहता है कि बाहर निकलो, अब वो उस घर में रहेगा। लेकिन सोना चीटीं मोंटी बंदर कि तरह उससे डरती नहीं बल्कि अपने सभी साथियों को बुलाती है और शीरो से कहती है कि ये घर मेरा है। अगर तुम मेरे घर आए तो हम सब तुम्हें काट लेंगे। खूब सारी चिटइयों को अपने सामने देख कर शीरो बहुत डर जाता है, उसे लगता है कि कहीं सब चीटीं मिल कर उसे काट न ले। ये सब देखते हुए वो सोना चीटीं से कहता है कि अच्छा मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा घर। मैं कहीं ओर अपना घर बना लूँगा। और ऐसा कहते हुए शीरो साँप जोर से वहाँ से भागता है। इधर सोना चीटीं की सभी मिलकर खूब तारीफ करते हैं।

मोरल- हमें कभी भी अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। हमेशा सबसे मिलकर रहना चाहिए।

घमंडी साँप और चींटी

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अपना-अपना काम

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ठंड का मौसम आया। बड़ी कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। दांतों को कट-कटाने वाली इस ठंड से ढोलकपुर जंगल में सब परेशान थे। और इस ठंड को देखते हुए मोंटी बंदर, चम्पा लोमड़ी और गज्जू हाथी तीनों एक साथ मिल कर एक घर में रहने को तैयार होते है। साथ ही ये फैसला भी करते है कि खाना चम्पा लोमड़ी बनाएगी, गज्जू हाथी घर का बाकी काम करेगा और मोंटी बंदर बाहर से खाने का समान, पानी वगैरा लेकर आएगा। अब जैसा उन तीनों के बीच तय हुआ उसी के हिसाब से सब मिल कर काम करने लगे और खुशी-खुशी साथ रह कर ठंड का मज़ा उठाने लगे। समय से पहले गज्जू हाथी घर का पूरा काम खत्म कर देता, मोंटी बंदर शाम होने से पहले ही खाने-पीने का समान बाजार से ले आता और चम्पा लोमड़ी बहुत प्यार से स्वादिष्ट खाना बनाकर सबके लिए पहले से तैयार कर के रखती। तो इस तरह से तीनों दोस्त आपस में मिल-जुल कर हंसी-खुशी रहने लगे। लेकिन इधर इन तीनों को इतने अच्छे से ठंड बिताते हुए देख कर बलैकी कौए को बहुत खराब लग रहा था। वो अपने मन में सोच रहा था कि एक वो है जो इतनी ठंड में बिल्कुल अकेला है। उसके पास खाने को भी कुछ नहीं है। और दूसरी तरफ ये तीनों है। कितना मज़ा कर रहे। तभी ब्लैकी कौआ सोचता है कि क्यों ना इन तीनों को अलग कर दिया जाए। तभी ब्लैकी कौए को मोंटी बंदर आते हुए दिखाई देता है।

 

वो मोंटी बंदर से कहता है, अरे मोंटी बंदर इतनी ठंड में तुम कहा समान लेने जा रहे हो। चम्पा लोमड़ी और गजजु हाथी को देखो। वो दोनों तो बाहर नहीं निकलते। तुमको उन लोगों ने नौकर समझ लिया है। क्या तुम उनके नौकर हो। ब्लैकी कौए कि बात सुन कर मोंटी बंदर को बहुत गुस्सा आता है और वो सीधे चम्पा लोमड़ी के पास जाता है और उससे कहता है कि अब से वो बाहर जाने का काम नहीं करेगा। वो इस घर का नौकर नहीं है। चम्पा लोमड़ी उसे समझाती है कि यहाँ सब एक बराबर हैं। फिर भी जब मोंटी बंदर उसकी बात नहीं मानता तो चम्पा लोमड़ी उसे अब घर में खाना बनाने का काम और खुद बाहर जाकर सामान लेने निकलती है। फिर जैसे ही मोंटी बंदर सब्जी काटता है उसकी चाकू से उंगली कट जाती। किसी तरह से खुद को संभालते हुए खाना गैस पर रखता है तभी उसका हाथ जल जाता है।

 

मोंटी बंदर के साथ ये सब होने पर वो जोर-जोर से रोने लगता है। जिसे सुन गज्जू हाथी और चम्पा लोमड़ी पहुंचते है और देखते ही सारा समान इधर-उधर फैला हुआ है और मोंटी बंदर अपना हाथ पकड़ कर रो रहा। फिर चम्पा लोमड़ी उसके पास जाती है और उससे कहती है मोंटी बंदर घर का काम करने में कोई नौकर नहीं हो जाता। जो जिसको आता है उसे वो काम अच्छे से करना चाहिए। चम्पा लोमड़ी कि बात सुन कर मोंटी बंदर कहता है हाँ चम्पा लोमड़ी मुझे माफ कर दो। मैं ब्लैकी कौए कि बातों में आ गया था। फिर चम्पा लोमड़ी झट से बढ़िया-बढ़ियाँ स्वादिष्ट खाना बनाती है जिसे मिल कर सब खाते है।

 

मोरल- घर का काम करने में,एक दूसरे की हेल्प करने में हमें कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि ये काम मेरा नहीं है, या मैं नौकर थोड़े न हूँ जो मैं ये काम करूँ। हमें हमेशा मिलजुलकर एक दूसरे की  हेल्प करते हुए हंसी-खुशी रहना चाहिए।   

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बात समय की

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फुनटी नाम का एक लड़का था। फुनटी बहुत समझदार था। उसे अपना हर काम समय पर करना अच्छा लगता। समय पर स्कूल जाना, समय पर पढ़ाई करना, समय पर खाना खाना और समय पर खेलना। वहीं फुनटी के घर के आस-पास रहने वाले कुछ बच्चे स्कूल से आने के बाद अपना पूरा समय खेल-कूद में लगाते। खूब हल्ला खूब शोर मचाते। हर रोज स्कूल भी देरी से पहुंचते। फुनटी अक्सर उन्हें हर काम समय पर करने को कहता। लेकिन वो फुनटी की बात नहीं मानते और उसका मज़ाक भी बनाते। एक दिन फुनटी अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था, जैसे ही खेलते हुए  एक घंटा पूरा हुआ फुनटी अपने घर जाने लगा। तभी उसके दोस्त उसे और खेलने के लिए रोकते हैं। अपने दोस्तों कि बात सुन कर फुनटी फिर उनसे कहता है, दोस्त हमे अपना हर काम समय पर ही करना चाहिए और ऐसा बोलते हुए फुनटी अपने घर जाने लगता है। तभी पीछे से उसके दोस्त उसे चिढ़ाते हुए बोलते हैं.. रोबोट, रोबोट। फुनटी तो रोबो है। और फिर ऐसा बोलते हुए अपना खेलना शुरू कर देते।

 

फिर एक दिन बड़ी से गाड़ी में कुछ लोग फुनटी का घर पूछते हुए उधर आए। फुनटी के घर के बाहर खेल रहे बच्चे उन्हें फुनटी का घर बताते हैं। साथ में वो बच्चे भी उनके पीछे-पीछे जाते हैं। गाड़ी का दरवाजा खुलता है। कोट पहने एक लंबा आदमी निकलता है। उस आदमी के हाथ में एक बैग होता है। आदमी घर के अंदर जाता है। फुनटी उनके सामने होता है। तभी फुनटी बोलता है, थैंक यू सर। मुझे इतना बड़ा अवॉर्ड देने के लिए। अवॉर्ड, फुनटी को अवॉर्ड। लेकिन किस चीज के लिए। क्या रोबोट बनने के लिए। फुनटी का एक दोस्त ये सब देख कर मन ही मन सोचता है। लेकिन तभी कोट पहने हुए वो

 

आदमी बोलता है, धन्यवाद तो हमें आपको कहना चाहिए। इतनी छोटी सी उम्र में आपने इतना बड़ा काम कर दिखाया। आपने पूरी दुनिया में सबसे छोटी उम्र में सबसे ज्यादा चीजें याद रखने का एक नया रिकॉर्ड बनाया है। यह हम सब के लिए बहुत गर्व कि बात है। इसके बाद फुनटी को वो अवार्ड देते हैं और वहाँ से चले जाते हैं। इधर उसके दोस्त बस फुनटी को देखते ही रह जाते है उन्हें खुद पर शर्म भी आती है कि कैसे वो सब मिल कर फुनटी को चिढ़ाया करते थे। फिर फुनटी उनके पास जाता है और कहता है दोस्त कुछ पाने के लिए हमें समय को बहुत रिस्पेक्ट देना चाहिए। हर काम समय पर करने से हमें एक दिन इसका फायदा जरूर मिलता है।  

मोरल- तो बच्चों इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हर काम अपने समय पर ही करना चाहिए और हमेशा अपने समय को रिस्पेक्ट देना चाहिए। जो काम जिस समय के लिए आपके पेरेंट्स या आपने तय किया अगर उस काम को आपने उसी समय कर लिया तो बिलीव मी समय एक दिन आपको इसके लिए जरूर देगा एक बड़ा अवॉर्ड।

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इतने भले मत बन जाना साथी

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एक बार की बात है ढोलकपुर जंगल में चम्पा लोमड़ी अपनी मस्ती में चली जा रही थी। तभी उसको खूब प्यास लगती है। वो इधर-उधर देखने लगती है। तभी उसको थोड़ी दूर में एक कुआं दिखाई देता है। वो तुरंत कुएं के पास जाती है। देखती है कुआं पानी से भरा है। बहुत खुश हो जाती है। और कुएं से पानी पीने लगती है। पानी पीते-पीते उसका अचानक पैर फिसल जाता है और चम्पा लोमड़ी पानी में गिर जाती है। कुएं का पानी बहुत मीठा होता है। चम्पा लोमड़ी को पानी बहुत अच्छा लगता है। वो अब और आराम से पानी पीने लगती है। जब चम्पा लोमड़ी अच्छे से पानी पी लेती है तो अब बाहर निकलने की कोशिश करती है। एक बार छलांग लगाती है,दो बार लगाती है और तीसरी बार और जोर से छलांग लगाती है लेकिन वो फिर भी नहीं निकल पाती।

 

अब उसे डर लगने लगता है कि ऐसा न हो वो उसी कुएं में ही रह जाए। अगर कुएं में रह गई तो घर में बनी रखी  गरमा-गरम आलू टिक्की कौन खाएगा। यही सोच कर अब वो जोर-जोर से चिल्लाने लगती है।। बचाओ, बचाओ। तभी उसकी आवाज सुन कर चंपू गधा आता है। और वो उससे पूछता है क्या हुआ चम्पा लोमड़ी। तुम कुएं के अंदर क्या कर रही हो। चम्पा लोमड़ी कहती है अरे चंपू गधे मैं बचाओ-बचाओ नहीं कह रही थी। मैं तो बोल रही थी आओ आओ तुम सब भी मीठा-मीठा पानी पी लो। इस कुएं का पानी बहुत मीठा है। चम्पा लोमड़ी की बात सुन कर चंपू गधा बिना कुछ सोचे-समझे कुएं में कूद जाता है। और पानी पीने लगता है। फिर चम्पा लोमड़ी से कहता है, हाँ चम्पा तुम बिल्कुल सही ख रही थी। इस कुएं का पानी सच में बहुत मीठा है।

 

जब चंपू गधा अच्छे से पानी पी लेता है तो चम्पा से कहता है अच्छा चम्पा अब बाहर कैसे निकलेंगे। ये तो बताओ। चम्पा तुरंत कहती है, मेरे पास बहुत अच्छा आइडिया है। ऐसा करो तुम कुएं की दीवार को पकड़ कर खड़े हो जाओ चंपू गधे। मैं तुम्हारे ऊपर चढ़ूँगी और कुएं से बाहर निकल जाऊँगी। और बाहर निकलते ही तुमको भी बाहर निकाल दूँगी। चंपू गधा फिर बिना-कुछ सोचे समझे उसकी बात माँ जाता है और कुएं की दीवार के पास आकर खड़ा हो जाता है। चम्पा लोमड़ी मुसुकराते हुए उस पर चढ़ती है और कुएं से बाहर निकल जाती है। उसके बाहर निकलते ही चंपू गधा उससे कहता है, अरे चम्पा मुझे तो बाहर निकलने का आइडिया बताओ। तभी चम्पा कहती है मेरे पास तो सिर्फ एक ही आइडिया था मेरे खुद के निकलने का। अब तुम अपना देखो। फिर चंपू गधा अब जोर-जोर से चिल्लाने लगता है बचाओ-बचाओ। लेकिन अब वहाँ पर कोई नहीं आता।

मोरल- हमें कुछ भी करने से पहले एक बार जरूर सोचना चाहिए कहीं कोई अपने फायदे के लिए आपका गलत फायदा तो नहीं उठा रहा। और हमें हमेशा ऐसे लोगों से सतर्क भी रहना चाहिए। 

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झगड़ालू मेंढ़क की कहानी

एक बार की बात है ढोलकपुर जंगल में मेडी नाम का एक मेढक था। मेडी मेढक था तो सारे मेढक में सबसे बड़ा लेकिन वो बिल्कुल भी समझदार नहीं था। वो बस दूसरों से लड़ने का मौका निकाला करता था। उसकी इस आदत से उसके बच्चे और आस-पड़ोस के बाकी मेढक भी काफी परेशान रहते थे और तो और मेडी मेढक को जैसे ही कोई अपनी तरफ आता देखता तो उसे देखते ही वो सब बोलते अरे भागो-भागों झगड़ालू ताऊ आ गया। पता नहीं कब शुरू हो जाए झगड़ा करने । और फिर इस तरह से मेडी मेढक से बस सब कोई बचने की कोशिश करता रहता।

 

एक दिन बगल के रहने वाले मेढक के घर पार्टी थी। उस मेढक ने आस-पास के सभी मेढक को अपने घर पार्टी में बुलाया। बस मेडी मेढक के परिवार को छोड़कर। पार्टी में सभी मेढक खूब मस्ती कर रहे थे। खूब बढ़ियाँ-बढ़ियाँ पकवान खा रहे थे। पकवान की खुशबू और गाने की आवाज़ मेडी मेढक के घर तक भी जा रही थी। ये सब देख मेडी मेढक की पत्नी को बहुत गुस्सा आता है और वो उससे कहती है, क्या जी, देखो तुम्हारे झगड़ालू नेचर की वजह से अब हमें कोई नहीं बुलाता। खाने की कितनी अच्छी खुशबू आ रही है। तुम्हारी वजह से इतनी अच्छी पार्टी का मजा नहीं ले पा रही। जाओ अब मैं भी रात का खाना नहीं बनाने वाली। आज खाना बाहर से आएगा। मेरी छुट्टी।

 

अपनी पत्नी की बात सुन कर मेडी मेढक उठता है और ढोलकपुर बाजार निकलता है रात का खाने लाने। मेडी मेढक अंदर ही अंदर बहुत गुस्से में होता है। वो अब सबसे बदला लेने की सोचने लगता है। तभी उसे सामने से शीरो साँप आता दिखाई देता है। मेडी मेढक तुरंत अपने मन में सोचता है, ये अच्छा है, मैं जाकर शीरो साँप को सभी मेढक के घर का पता बता देता हूँ। फिर शीरो साँप सबको एक-एक कर खा लेगा। बड़ें आयें, मुझको पार्टी में नहीं बुलाया। अभी सबक सिखाता हूँ सबको। और ऐसा सोचते हुए मेडी मेंढक तुरंत शीरो साँप के पास पहुंचता है और उससे कहता है, कैसे हैं शीरो जी आप। मेडी मेंढक को अपने पास खड़ा देख शीरो साँप तुरंत कहता है, क्या तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता। अगर मैंने तुम्हें खा लिया तो। तभी मेडी मेढक कहता है, जी मुझे अकेले खा कर आपको क्या मिलेगा। चलिए मैं आज आपकी पार्टी कराता हूँ। मेरे घर के अगल-बगल जितने भी मेढक है उन्हें आप खा सकते हैं।

 

शीरो साँप तुरंत कहता है, क्या कह रहे हो मेडी। तुम मुझे अपने सभी साथी मेढक को खाने को कह रहे हो। एक बार फिर से सोच लो। मेडी मेढक कहता है, हाँ-हाँ शीरो जी मैंने अच्छे से सोच लिया है। बहुत परेशान करते थे सब मुझे। मेरी बात नहीं मानते थे। अब अच्छे से सबक सिखाता हूँ मैं उन्हें। इसके बाद मेडी मेढक शीरो साँप को लेकर अपने घर पहुंचता है और फिर एक-एक कर सभी मेढक का घर बताने लगता है। शीरो साँप धीरे बहुत धीरे से सबके घर जाता है और एक-एक कर उन्हें खाने लगता है। जब शीरो साँप सभी मेंढ़क को खा लेता है तब वो मेडी मेढक के घर जाता है और उससे कहता है, वाह मेडी मेंढक आज तो मज़ा आ गया। बहुत बढ़ियाँ पार्टी कारवाई है तुमने मेरी। लेकिन वो क्या है न मुझमे एक बहुत बुरी आदत है। जब मैं कुछ ज्यादा खा लेता हूँ तो मुझे और भूख लगने लगती है। तो मुझे और भूख लग रही। वैसे अब तुम्हारे परिवार के सिवा और कोई मेढक भी नहीं बचा जिसे मैं खा सकूँ। मेडी मेंढक ये सब सुन कर बहुत गुस्से में आ जाता है। और शीरो साँप से झगड़ा करते हुए कहता है, अरे ऐसे कैसे तुम हमें खाओगे। एक तो मैंने तुम्हारी पार्टी कारवाई। अपने सभी साथी मेढक को खाने दिया और तुम हो कि हमें शुक्रिया कहने के बदले तुम उल्टा हमें ही खाना चाहते हो। मेडी ये सब बोल ही रहा था तभी उसकी पत्नी पीछे से कहती है, अजी देखा आपने, कितनी बार मना किया था किसी से लड़ाई-झगड़ा मत किया करो। थोड़ा अपने गुस्से में काबू रखा करो। लेकिन नहीं। हमारे सभी साथी को ये शीरो खा गया। अब हमारी बारी। अपनी पत्नी की बात सुन कर मेडी कुछ कहता तभी शीरो साँप आता है और एक-एक कर के मेडी, उसकी पत्नी और उसके बच्चों को खा लेता है । और फिर इस तरह से उस जगह के सभी मेढक खत्म हो जाते हैं।

 

मोरल- हमें कभी एक-दूसरे से लड़ाई झगड़ा नहीं करना चाहिए। हमेशा सबसे मिलजुल कर रहना चाहिए। सबसे बड़ी बात हमें अपने गुस्से पर काबू रखना चाहिए।   

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तुमसे न हो पाएगा

एक बार ढोलकपुर जंगल में चीका और मीका आपस में खेल रहे थे। तभी वहाँ पर रुस्तम शेर और रूपा शेरनी आते हैं। दोनों बच्चों को एक साथ खेलते देख दोनों बहुत खुश हो जाते हैं, क्योंकि इस तरह से एक साथ दोनों बच्चे बहुत कम ही खेलते नजर आते थे। ज्यादातर समय चीका और मीका का आपस में लड़ने में ही जाता था। तभी रुस्तम शेर कहता है। अरे मेरे प्यारे बच्चों चीका और मीका। खेलते-खेलते आपस में लड़ने मत लगना। और मीका तुम अपने बड़े भाई को ज्यादा परेशान भी मत करना।

 

ऐसा बोलकर रुस्तम शेर और रूपा शेरनी वहाँ से जाने लगते हैं। जाते-जाते रूपा शेरनी बोलती है। अच्छा बच्चों ज्यादा समय मत लगाना और खेलने के बाद जल्दी घर आना। चीका-मीका रूपा शेरनी को हाँ बोलते हैं और फिर से खेलना शुरू कर देते हैं। और तभी चीका इतनी तेज़ से गेंद मारता है कि गेंद जाकर एक कुएं में गिर जाती है। तभी मीका कहता है, भईया गेंद तो कुएं में गिर गई। अब क्या करेंगे हम। फिर चीका बोलता है भाई तुम परेशान न हो, मैं अभी जाकर निकाल कर लाता हूँ। और ऐसा बोलते हुए चीका कुएं से गेंद निकालने की कोशिश करता है और तभी उसका पैर फिसलता है और वो कुएं में गिर जाता है। बड़े भाई चीका के कुएं में गिरते ही मीका जोर-जोर से चिल्लाने लगता है, भाई-भाई कोई बचाओ मेरे भाई को। मैं तो बहुत छोटा हूँ मैं कैसे बचा पाऊँगा अपने भाई को, कोई तो आओ। लेकिन वहाँ आस-पास कोई नहीं होता जो चीका को बचा सके।

 

तभी मीका को एक रस्सी दिखाई देती है। वो दौड़ कर जाता है और रस्सी उठा कर लेकर आता है। फिर कुएं में फेंकते हुए बोलता है, भाई इस रस्सी को ज़ोर से पकड़ना। मैं तुमको बाहर से खिचूँगा। फिर चीका रस्सी पकड़ता है और मीका बाहर से रस्सी खीचना शुरू करता है। अब क्यों कि चीका बड़ा और भारी होता है इसलिए छोटे से मीका को खूब मेहनत खूब ताकत लगानी पड़ती है। लेकिन वो बिना कुछ सोचे बस अपनी पूरी ताकत भाई चीका को बचाने में लगा देता है। तभी मीका और जोर से रस्सी बाहर कि और खिचता है जिसे पकड़ कर चीका बाहर आ जाता है।

 

कुएं से बाहर निकलते ही चीका तुरंत मीका को अपने गले लगाता है और उसे पकड़ कर जोर-जोर से रोते हुए बोलता है, मेरे छोटे भाई तुमने आज मुझे बचा लिया। तुम तो मुझसे कितने छोटे हो। तुममे इतनी ताकत आई कहाँ से। तभी मीका बोलता है भाई मेरे पास ताकत कहाँ से आई ये तो मुझे नहीं पता, लेकिन एक बात में अच्छे से समझ गया। अगर आपसे कोई बोले कि ये काम तुमसे नहीं हो पाएगा। तो मैं अब से मैं कभी इस बात को नहीं मानूँगा। भाई ऐसा कोई भी काम नहीं है जिसे हम कर नहीं सकते। इसके बाद दोनों भाई हाथ में हाथ डाल कर घर पहुंचते हैं।

मोरल : कोई भी काम ऐसा नहीं है जिसे हम नहीं कर सकते,  बस हमें उसके करने का तरीका पता होना चाहिए। 

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शर्मीली सिम्मी

एक बार की बात है एक छोटी सी प्यारी सी बच्ची थी। उसका नाम था शम्मी। शम्मी पढ़ाई में बहुत होशियार थी। पूरी क्लास में उसके नंबर सबसे ज्यादा भी आते। बस शम्मी में एक कमी थी। वो शर्माती बहुत थी। इसलिए शम्मी को घर, बाहर यहाँ तक की स्कूल के बच्चे भी शर्मीली शम्मी कह कर ही बुलाते थे। जब भी कोई बच्चा उसे कहता, अरे वो देखो शर्मीली शम्मी आ रही..तो उसको बहुत बुरा लगता। लेकिन अपने शर्मीले पन के कारण वो उनको कुछ भी नहीं कहती, उन्हें एक बार भी मना भी नहीं करती बस अंदर ही अंदर गुस्सा होकर वहाँ से चली जाती। ऐसे ही एक दिन शम्मी के घर उसकी बुआ अपने बच्चों के साथ आई। बुआ शम्मी को बहुत प्यार करती थीं। शम्मी भी करती थी लेकिन वो इतना शरमाती कि बुआ से कुछ कह भी नहीं पाती। इधर बुआ के बच्चे जैसे ही घर के अंदर आए सबसे पहले शम्मी को देखते ही बोले, ओर शर्मीली शम्मी। कैसी हो, और फिर जोर-जोर से हंसने लगे।

 

बुआ ने बच्चों को तुरंत डांटा लेकिन बच्चे बार-बार उसे शर्मीली-शर्मीली कह कर चिढ़ाते रहे और शम्मी के खिलौनों से भी खेलते रहे। लेकिन शम्मी की बुआ जानती थी कि शम्मी अपने शर्मीले नेचर की वजह से कुछ बोल नहीं पा रही है। बुआ शम्मी के लिए खूब सारी चॉकोलेटस और गिफ्ट भी लाई थी। उन्होंने शम्मी को अपने पास बुलाया और उससे कहा, शम्मी ये लो..ये सब तुम्हारे लिए है। शम्मी शरमाती हुई कहती है, थैंक यू बुआ। शम्मी बुआ से समान ले ही रही थी कि तभी बुआ के दोनों बच्चे आते हैं और शम्मी की चॉकोलेटस लेने लगते हैं। शम्मी उन्हें मना नहीं कर पाती क्यों कि शम्मी को आ रही थी शर्म। और फिर इस तरह शम्मी की पूरी चॉकोलेट वो बच्चे उसी के सामने खा लेते हैं और ये सब देख कर शम्मी बिना कुछ बोले वहाँ से अंदर ही अंदर गुस्से से भर कर चली जाती है फिर अपने कमरे में बैठ कर चुप-चाप रोने लगती है। उसको लगता है कि वो ऐसी क्यों हैं। वो क्यों किसी से खुल कर बात नहीं कर पाती। क्यों किसी को कुछ बोलने में उसे शर्म आती है। और ऐसा सोचते-सोचते वो अकेले में खूब रोने लगती है। तभी वहाँ पर शम्मी कि बुआ आती हैं।

 

शम्मी को रोते देख पहले वो उसे गले से लगाती हैं फिर शम्मी से बोलती हैं, शम्मी मुझे पता है बेटा कि तुम बहुत समझदार हो। पढ़ने में भी बहुत अच्छी हो। लेकिन शम्मी तुम अपने शर्मीले स्वभाव की वजह से बस किसी से बात नहीं कर पाती। कुछ बोल नहीं पाती हो। इसके लिए पता है तुम्हें क्या करना चाहिए। अपने आँसू पोंछ कर तुरंत शम्मी कहती है क्या बुआ। बुआ कहती हैं सबसे पहले अपने मन इस बात को हमेशा के लिए याद रख लो कि तुम किसी से भी कम नहीं हो। तुम में भी बहुत सारी खूबियाँ हैं। उसके बाद बीटा जो तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त है या तुम्हें जिससे भी बात करना अच्छा लगता है उससे बात करना शुरू करो। खूब बात करो। और मेरी प्यारी बच्ची दूसरों के साथ खेलना शुरू करो। तुम जितना दूसरों से बात करोगी उनकी बातें सुनोगी तो धीरे-धीरे तुम फिर शर्माना भी छोड़ दोगी। समझी मेरी प्यारी बेटी। शम्मी मुसकुराते हुए बुआ से कहती है, हाँ बुआ अब मैं अच्छे से समझ गई।

मोरल- हमें इतना भी नहीं शर्माना चाहिए जिससे हमें नुकसान उठाना पड़ जाए।

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सिमी मछली की शरारतें

एक बार ढोलकपुर जंगल में सिमी नाम की मछली रहती थी। सिमी मछली थोड़ी नटखट थी। हर समय कुछ-न कुछ शैतानी करने के बारे में सोचा करती थी। ऐसे ही एक दिन वो अपनी माँ के पास गई और बोली माँ कितने दिन हो गए है हम लोग तालाब के अंदर ही हैं। चलो न माँ पानी के ऊपर। मुझे पानी के ऊपर जाकर खेलना है। प्लीज माँ। सिमी की बात सुन कर माँ ने कहा- नहीं सिमी अभी नहीं। अभी शिकारी होंगे बाहर। रात में चलेंगे, जब कोई भी नहीं होगा। तब खूब मन भर खेल लेना तुम। तभी सिमी कहती है, शिकारी ये कौन होते हैं माँ। और इनकी वजह से हम क्यों नहीं जा सकते बाहर। पहले आप ये बताओ मुझे। फिर माँ कहती है, बेटा शिकारी वो होते हैं जो हम जैसों को पकड़ते हैं और अगर हम बाहर गए तो ये हमें अपने जाल में पकड़ लेंगे। फिर हम सब एक दूसरे से अलग हो जाएंगे, समझी मेरी प्यारी सिमी। इसलिए माँ की बात मानो और जाओ अभी कुछ ओर काम करो।

 

सिमी उस समय अपनी माँ के सामने से तो चली जाती है लेकिन बाहर जाकर खेलने की अपनी ज़िद पर भी पड़ी रहती है। और फिर जैसे ही देखती है कि माँ उसे नहीं देख रही तो वो तालाब के ऊपर पहुँच जाती है। ऊपर पहुंचते ही उसे खुला नीला आसमान दिखाई देता है। चिड़ियों की मीठी-मीठी आवाज सुनाई देती है। धीमी-धीमी ठंडी हवा चल रही होती है। ये सब देख कर सिमी का मन बहुत खुश हो जाता है। वो जोर-जोर हँसते-मुसकुराते हुए पानी के ऊपर खेलने लगती है। तभी सिमी आगे बढ़ने की कोशिश करती है लेकिन वो अपना शरीर नहीं हिला पाती। उसका पूरा शरीर उसे बंधा-बंधा लगता है और फिर उसे एक आवाज सुनाई देती है, वाह आज तो मज़ा आ गया। पहली बार में ही इतनी अच्छी मछली पकड़ में आ गई। और ऐसा बोलते हुए शिकारी जाल को अपनी तरफ खिचने लगता है। तभी सिमी कहती है, भाई, मुझे पानी से मत निकलो। अगर मैं पानी से बाहर निकली तो मैं कैसे जिंदा रहूँगी। शिकारी कहता है, सॉरी, मैं इसमे कुछ नहीं कर सकता। मैं एक शिकारी हूँ और मुझे मछलियाँ चाहिए।

 

शिकारी की ये बात सुन कर सिमी तुरंत अपना दिमाग लगाती है और शिकारी से कहती है, अच्छा मैं अगर तुम्हें ओर खूब सारी मछलियाँ दूँ तो। शिकारी तुरंत जाल को थोड़ा ढीला करता है और कहता है वो कैसे। तभी सिमी कहती है, मेरे खूब सारे दोस्त हैं। मैं जाती हूँ और उन्हें भी लाती हूँ। मैं चाहती हूँ कि हम सभी दोस्त एक साथ रहें। शिकारी कहता है क्या सच में। ऐसा तो नहीं तुम जाल से निकलने के लिए ऐसा कह रही। तभी सिमी कहती है, अब आपकी मर्जी है कि आपको एक मछली चाहिए या फिर बहुत सारी।

 

ये सुनकर शिकारी तुरंत जाल हटा देता है और सिमी से कहता है, ठीक है जल्दी जाओ और सबको लेकर आओ। मैं यहीं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ। और फिर जाल के खुलते ही सिमी न इधर देखती है और न उधर सीधे नीचे अपनी माँ के पास जाकर रुकती है। माँ को देखती ही सिमी खूब कस कर माँ के गले लगती है और कहती है माँ तुम बहुत अच्छी हो माँ। अब मैं तुम्हारी हर बात मानूँगी माँ। और उधर शिकारी बस ज्यादा मछलियों के आने का इंतजार ही करता रह जाता है।

मोरल- हम किसी मुसीबत में न फंसें इसके लिए हमें हमेशा अपने पेरेंट्स की बात माननी चाहिए और अगर गलती से किसी मुसीबत में फंस जाएं तो हमें उस मुसीबत से निकलने का रास्ता निकालना चाहिए.

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