​पंचतंत्र की कहानी 

 कबूतर और  मधुमक्खी

Moral stories in hindi 

एक बार की बात है एक जंगल मे नदी के किनारे पेड़ पर एक कबूतर रहता था | उसी जंगल मे एक दिन मधुमक्खी उड़ते हुए आई और नदी मे गिर गई। नदी का पानी बहुत गहरा था । मधुमक्खी ने खुद को संभालने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो खुद को पानी से नहीं निकाल सकी और वो अचानक पानी में डूबने लगी।

जब उसको लगने लगा कि अब वह नहीं बच पाएगी तब वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी। मधुमक्खी की आवाज सुन कर वहाँ कबूतर आ जाता है और मधुमक्खी को बचाने का उपाय सोचने लगता है। तभी वह झट से पास पड़े पत्ते को उठाता है और मधुमक्खी के पास जाकर डाल देता है। उसके बाद मधुमक्खी उस पत्ते पर चढ़ जाती है और अपने पंख सुखाने लगती है। पंख के सुखते ही मधुमक्खी वहाँ से उड़ जाती है। लेकिन जाते-जाते मधुमक्खी को देख कर मुस्कुराती है और उसे शुक्रिया कहती है।

इसके बाद कई दिन बीत जाते हैं, तभी एक दिन कबूतर पेड़ पर सो रहा था, तभी वहाँ एक शिकारी आता है और कबूतर के देख कर उस पर जाल डालने की कोशिश करता है। लेकिन तभी वहाँ पर मधुमक्खी आ जाती है और वो यह सब देख लेती है और फिर बिना देरी किए शिकारी के हाथ में जोर से डंक मारती है, चोट लगते ही शिकारी जोर-जोर से चिल्लाने लगता है।

तभी कबूतर की नींद खुल जाती है और वो शिकारी को देखते ही वहाँ से उड़ कर जाने लगता है। जाते समय वह मधुमक्खी को देख कर मुस्कुराता है और उसको शुक्रिया कहता है।

 

मोरल- हमें हमेशा सबकी मदद करनी चाहिए। आगे चल कर कभी न कभी हमे भी इसका फायदा जरूर मिलता है।

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बोलने वाला पेड़ 

​Moral  Stories in hindi 

बहुत समय पहले की बात है। दो दोस्त थे। एक का नाम था रामू और दूसरे का नाम था भोला। रामू बहुत सीधा था तो वही भोला उतना ही चालाक था। एक बार भोला रामू के पास आया और उससे बोला कि शहर चलकर खूब सारा पैसा कमा कर लाते हैं। रामू भोला की बात मान कर उसके साथ शहर चला जाता है। वहाँ से वो दोनों खूब सारा पैसा कमा कर लाते हैं। फिर रामू भोला से कहता है इतना सारा धन अगर वो घर मे रखेंगे तो कोई चुरा सकता है। इसलिए उसे अपने घर के पास ही नीम के पेड़ में छुपा देंते हैं और उन दोनों में से जिसको भी धन की जरूरत होगी वो एक दूसरे को साथ लेकर ही धन निकालने जाएगा। कोई भी अकेले धन निकालने नहीं जाएगा । रामू फिर से भोला की बात मान जाता है और धन को नीम के पेड़ के नीचे दोनों दोस्त मिलकर गाड़ देतें है।

कुछ दिनों बाद भोला रामू के पास जाता है और उससे कहता है कि उसे धन की जरूरत है। रामू भोला के साथ धन निकालने के लिए जाता है और फिर दोनों दोस्त धन निकालने के लिए नीम के पेड़ के नीचे से मिट्टी निकालना शुरू करतें हैं। लेकिन इन दोनों को धन नहीं मिलता। फिर भोला रामू पर गुस्सा करने लगता है और उससे कहता है कि धन उसी ने लिया है। रामू भोला को मना करते हुए कहता कि धन उसने नहीं लिया। फिर भोला नीम के पेड़ से पूछता है कि धन किसने लिया। नीम के पेड़ से आवाज आती है कि धन भोला ने लिया। फिर दोनों जोर जोर से झगड़ा करने लगते हैं। बात राजा तक पहुँच जाती है।

राजा उन दोनों दोस्तों से कहता कि कल नीम के पेड़ की गवाही के बाद ही कुछ फ़ैसला लेगा। अगले दिन राजा रामू और भोला के साथ नीम के पेड़ के पास जाता है और नीम के पेड़ से कहता है, है नीम देव ! धन किसने चुराया है। तभी नीम के पेड़ से आवाज़  आती है की धन रामू ने चुराया है। रामू पहले तो मना करता है फिर वो पास ही पड़ी कुछ लकड़ियों को उठाता है और उसे नीम के पेड़ के नीचे रख कर उसमें आग लगा देता है। तभी नीम के पेड़ से बचाओ–बचाओ की आवाज़ आती है। राजा अपने सिपाही से उस आदमी को निकालने को कहता है और वो आदमी भोला का पिता होता है। फिर भोला राजा से कहता है कि उसने ही वो सारा धन चुराया था। राजा भोला और उसके पिता को जेल में डाल देता है और रामू को सारा धन मिल जाता है।

मोरल- हमें दोस्ती सोच-समझ कर करनी चाहिए और मुसीबत आने पर घबराना नहीं चाहिए।    

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आलसी पत्थर  

Moral Stories in hindi

एक बार की बात है। एक मूर्ति बनाने वाले को मूर्ति बनाने के लिए पत्थर चाहिए था। इसके लिए वो जंगल पहुंचा। वहाँ उसे एक पत्थर मिला। जिसे देख कर वह बहुत खुश हो गया और लेकर वापस लौटने लगा। रास्ते में आगे चलते हुए उसे एक और पत्थर मिला। उस दूसरे पत्थर को भी उसने अपने पास रख लिया।

 

घर पहुँचने पर उसने अपना औजार निकाला और पत्थर पर काम करना शुरू किया। जैसे ही उसने पहले पत्थर को ज़ोर-ज़ोर से मारना शुरू किया वो चिल्लाने लगा और कहने लगा कि छोड़ दो मुझे। मुझे कुछ नहीं बनना। मुझे बहुत दर्द हो रहा है। पहले पत्थर की आवाज सुनते ही मूर्तिकार उसपर काम करना बंद कर देता है और दूसरे पत्थर पर काम करना शुरू करता है। लेकिन दूसरा वाला पत्थर एक बार भी कुछ नहीं बोलता। मूर्तिकार ने उस पर कई चोंट लगाई। वो चुप-चाप काम करवाता रहा। फिर एक दिन उस पत्थर से भगवान की बहुत खूबसूरत मूर्ति बन कर तैयार होती है।

 

गॉव के लोग उस मूर्ति को लेकर मंदिर मे रख देते हैं और उस पर दूध और लड्डू का भोग लगाते हैं। वहीं पहले वाले पत्थर को नारियल फोड़ने के लिए इस्तेमाल करते हैं। मूर्ति वाले पत्थर को देखकर पहला वाला पत्थर उससे कहता है कि काश वो भी उसकी तरह होता तो उसको भी लड्डू खाने को मिलते। इस पर मूर्ति वाला पत्थर कहता है कि अगर तुमने पहले थोड़ा दर्द सह लिया होता तो आज मेरी जगह तुम ही होते। मूर्ति बने पत्थर की बात सुनकर पहले पत्थर को अपनी गलती समझ आती है और वो उसी तरह रहने लगता है।

मोरल- : अगर हमें जीवन में सफलता प्राप्त करना है तो इसके लिए हमें कड़ी मेहनत से कभी भागना नहीं चाहिए।    

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तीन मछलियाँ और मेढक 

Moral Story in hindi

एक बार की बात है, एक तालाब में तीन मछलियाँ रहती थी। तीनों की आपस में गहरी दोस्ती थी, लेकिन तीनों के विचार एक दूसरे से बिल्कुल अलग थे। तभी एक दिन शाम को तीनों मछलियाँ आपस में बात कर थी कि वहाँ पर मेढक आया और बोलने लगा। अच्छा तुम तीनों एक बात बताओ, मान लो तुम्हारे पास कोई मुसीबत आने वाली है, ऐसे में तुम तीनों क्या करोगी।

मेढक की बात सुनकर पहली मछली बोलती है मैं तो उस मुसीबत के आने से पहले ही उससे बचने का उपाय करूंगी। तभी दूसरी मछली बोलती हैं मैं मुसीबत आने के बाद सोचूँगी कि मुझे करना क्या है। वहीं तीसरी मछली कहती है भईया मैं तो मुसीबत को अपनी किस्मत के ऊपर छोड़ दूँगी। अगर मेरी किस्मत मे लिखा होगा मुसीबत से बचना तो मैं बच ही जाऊँगी। तीनों मछलियों की बात सुन कर मेढक उनसे कहने लगा, अभी-अभी मैंने एक शिकारी को बात करते सुना कि वह कल सुबह इस तालाब में आएगा और तुम सब को पकड़ कर ले जाएगा। मेरी तो यही सलाह है कि तुम सब इस तालाब से कहीं दूर चली जाओ।

मेढक की बात सुन कर पहली मछली वहाँ से जाने का फैसला लेती है और बाकि मछलियों से भी वहाँ से चलने को कहती है। लेकिन दोनों में से कोई मछली वहाँ से नहीं जाती। अगले दिन सुबह होती है। शिकारी आता है। शिकारी को आता देख दूसरी मछली भी वहाँ से चली जाती है। अब बचती है तीसरी मछली, वो वहाँ से नहीं जाती। वो किस्मत के भरोसे रहती है। तभी शिकारी अपना जाल तालाब मे फेंकता है और उस तीसरी मछली को पकड़ लेता है। शिकारी के साथ उस मछली को जाता देख मेढक कहता है, काश ये किस्मत के भरोसे ना रहती। दोनों मछलियों की तरह समय से पहले ही अगर कुछ उपाय सोच लेती, तो आज ये बच जाती।

मोरल- : हमें कभी किस्मत के भरोसे नहीं रहना चाहिए। हमें हमेशा मेहनत करते रहना चाहिए। मेहनत से कभी भागना नहीं चाहिए।

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राजा और गमले की कहानी

Moral Story in hindi

एक बार की बात है, एक राजा था। वो अब बूढ़ा हो चुका था। उसको बस अब आराम करना था। इसके लिए उसने अपना उत्तराधिकारी बनाने की योजना बनाई। फिर एक दिन उसने अपने राज्य में एक सभा बुलाई। जिसमे राज्य के सभी लोगों को आने को कहा। राजा का आदेश सुनकर राज्य के सभी लोग उस सभा मे शामिल हुए। फिर राजा ने सबसे कहा है कि वह अब राज्य के ही किसी अन्य व्यक्ति को राजा बनाना चाहता है। राजा की बात सुनकर सभी लोग खुश हो गए। तभी राजा ने सबसे फिर कहा कि मैं आप सबको एक-एक गमला दे रहा हूँ।

इस गमले में मैंने बीज डालकर रखा है। जो भी व्यक्ति इस बीज से फूलों का पौधा उगाएग, वह ही व्यक्ति अगला राजा बनेगा और इस काम के लिए राजा ने सभी को एक हफ्ते का समय दिया। एक हफ्ते बाद फिर से सभा होती है। राज्य के हर व्यक्ति के हाथों मे फूलों वाला गमला होता है, सिवाय एक छोटी लड़की के। उसके हाथ में सिर्फ मिट्टी वाला ही गमला होता है। राजा जैसे ही उस छोटी लड़की को देखता है उसे अपने पास बुलाता है और सबसे कहता है कि अब से उसका राज्य यही छोटी लड़की संभालेगी। सारे लोग राजा पर गुस्सा करने लगते हैं।

तभी राजा कहता है कि मैंने जो बीज वाला गमला आप सब को दिया था, उससे कोई भी पौधा नहीं उग सकता था। लेकिन आप सबने अपनी तरफ से फूलों वाला पौधा लगाया। सिर्फ इस बच्ची ने ईमानदारी दिखाई। इसलिए मेरे राज्य को अब यही बच्ची संभालेगी। राजा की बात सुनकर सभी को अपने किए पर शर्म आती है और बिना कुछ कहे वहाँ से चले जाते हैं।

मोरल- : चाहे फायदा कितना भी बड़ा क्यों ना हो, हमें हमेशा ईमानदारी से काम करना चाहिए। भविष्य में आगे चल कर हमें इसका फायदा जरूर मिलता है।   

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बेवकूफ गधे

Moral Story in hindi

एक जंगल में दो गधे रहते थे। दोनों के घर के बीच एक नदी भी पड़ती थी और उस नदी के ऊपर एक पुल बना था। पुल काफी पुराना हो चुका था इसलिए उस पुल पर एक समय में एक ही आदमी जा सकता था।  एक दिन दोनों गधे अपने-अपने घर से घास खाने के लिए जंगल की तरफ गए। दोनों ही गधे बहुत भूखे थे। इसलिए घास खाते-खाते नदी के पास चले गए और पुल के ऊपर चढ़ गए। जब दोनों गधों ने एक दूसरे को देखा तो आपस में  लड़ने लगे। पहले गधे ने दूसरे गधे से कहा कि वो पुल पर सबसे पहले आया है  इसलिए वो सबसे पहले पुल पार करेगा।

 

दूसरे गधे ने कहा कि वो पुल पर सबसे पहले आया है और इस तरह से दोनों गधे ज़ोर- ज़ोर से लड़ने लगे। कुछ समय बाद दोनों गधे लड़ते-लड़ते पुल के बीच आ गए। पुल तो था पतला और पुराना। इसलिए पुल दोनों गधों का भार नहीं उठा पाया और पुल टूट गया। अब क्योंकि नदी तो होती है बहुत गहरी तो दोनों गधे उस नदी मे डूब जाते हैं।

मोरल- : हमें कभी आपस में झगड़ा नहीं करना चाहिए। हमें हमेशा मिल-जुल कर रहना चाहिए।  

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चालाक मुर्गा

Moral Story in hindi

एक बार की बात है, जंगल में एक मुर्गा रहता था। पेड़ के ऊपर मुर्गे ने अपना घर बना रखा था। मुर्गा बहुत चालाक था। रोज सुबह सूरज निकलते ही वो बांग देना शुरू कर देता था । बाद में वो खाने की तलाश में अपने घर से निकल जाता और फिर शाम होते ही अपने घर वापस भी आ जाता था। उसी जंगल में एक लोमड़ी भी रहती थी। वह कई दिनों से मुर्गे को खाना चाह रही थी, लेकिन हर बार मुर्गा उससे बच जाता था।

 

तो ऐसे ही एक दिन मुर्गा पेड़ के ऊपर बने अपने घर में आराम कर रहा था और इधर लोमड़ी को बहुत ज़ोर की भूख लगी थी। तभी उसकी नजर पेड़ पर बैठे मुर्गे पर गई। वो तुरंत अपने दिमाग में मुर्गे को खाने की योजना बनाने लगी। योजना बनाने के बाद वह लोमड़ी मुर्गे के पास गई और उससे बोली, और मुर्गे भईया कैसे हो। लोमड़ी को देखते ही मुर्गा समझ गया कि जरूर ये लोमड़ी उसको खाने आई है। इसके बाद बहुत प्यार से मुर्गे ने लोमड़ी से कहा, हाँ लोमड़ी बहन मैं बिल्कुल ठीक हूँ, तुम बताओ कैसे आना हुआ तुम्हारा। तभी लोमड़ी बोली, एक जरूरी बात बतानी थी तुमको।

 

हमारे जंगल के राजा शेर ने आदेश दिया है कि अबसे कोई भी किसी को परेशान नहीं करेगा। सारे जानवर एक-दूसरे से मिल कर रहेंगे। तो इसी बात पर नीचे आओ। हम दोनों मिलकर एक दूसरे के गले लगते हैं। लोमड़ी की बात सुनकर मुर्गा तुरंत बोला, अच्छा तभी हमारे जंगल के राजा शेर इधर आ रहे हैं।  शायद वो तुमको अपने गले लगाना चाहते हैं। शेर का नाम सुनते ही लोमड़ी बिना देरी किए वहाँ से ज़ोर से भागती है और कहती है भईया मुझे नहीं करनी शेर से दोस्ती। लोमड़ी को भागता देख मुर्गा ज़ोर-ज़ोर से हँसता है।

मोरल- इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें किसी की भी बातों में आने से पहले अपने दिमाग का जरूर इस्तेमाल करना चाहिए।

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राजा और मूर्ख बंदर

Moral Story in hindi

एक बार की बात है, एक राजा था। उसके पास एक बंदर भी था। राजा बंदर से ही अपना सारा काम करवाता था। राजा को लगता था कि बंदर से ज्यादा पूरे राज्य में कोई और भरोसे लायक नहीं है। इसके लिए राजा हर समय बंदर को अपने साथ ही रखता था। बंदर भी राजा की सेवा करने से पीछे नहीं हटता था। जब राजा कहे बंदर हवा करो, तो बंदर तुरंत हवा करने लगता। जब राजा कहे बंदर पानी लाओ, तो बंदर पानी देता। बंदर ने खुद को पूरी तरह से राजा की सेवा मे लगा रखा था। बस बंदर में एक बुराई थी। वो किसी भी काम को करने में अपना दिमाग नहीं लगाता था। बस राजा जो भी बोलता उसको पूरा करने में लगा रहता।

 

ऐसे ही एक दिन राजा आराम कर रहा था। बंदर उसे हवा कर रहा था। आराम करते-करते राजा को नींद आ जाती है और वो सो जाता है। तभी अचानक वहाँ एक मक्खी आती है। बंदर मक्खी को भगाने लग जाता है। पहले तो बंदर मक्खी को हाथ से भगाने की कोशिश करता है लेकिन मक्खी नहीं जाती बल्कि राजा के सिर पर जाकर बैठ जाती है। फिर बंदर वहीं पास पड़े तलवार को उठा लेता है और उससे मक्खी को भगाता  है। तलवार चलते ही मक्खी उस जगह से उड़ जाती है और बंदर तलवार से राजा के सिर के आधे बाल उड़ा देता है। सिर पर तलवार पड़ते ही राजा की नींद खुल जाती है और वो देखता है कि उसकी तलवार लिए बंदर उसके सीने पर बैठा है और मक्खी उसकी नाक पर। नाक पर मक्खी को बैठा देख बंदर फिर से तलवार चलाता है और इस बार राजा की आधी मूंछ कट जाती है।

 

मूंछ कटते ही राजा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए बंदर को अपने ऊपर से हटाता है और वहाँ से भागता है। इसके बाद राजा के पीछे-पीछे मक्खी भागती है और मक्खी के पीछे-पीछे तलवार लिए बंदर भागता है।

मोरल- :  हमें मूर्ख लोगों से बच कर ही रहना चाहिए और अपने काम के लिए किसी पर भी निर्भर नहीं रहना चाहिए।

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जादुई चक्की

Moral Story in hindi 

एक बार की बात है, एक गावं में दो भाई रहते थे। बड़ा भाई अमीर और चालाक था, वहीं छोटा भाई गरीब और सीधा था। बड़े भाई ने चालाकी से छोटे भाई की सारी दौलत अपने नाम भी कर ली थी। दीवाली का दिन था। छोटे भाई के यहाँ कुछ भी खाने को नहीं था। उसकी पत्नी और बच्चे सब दुखी थे इसलिए वो पैसे मांगने अपने बड़े भाई के यहाँ जाता है। बड़ा भाई उसे कुछ भी नहीं देता और अपने घर से निकाल देता है।

दुखी होकर छोटा भाई अपने घर लौटने लगता है, कि तभी उसकी नज़र सामने नदी पर जाती है। वो कुछ देर के लिए वहाँ बैठ जाता है। तभी नदी से एक औरत निकलती है और उससे पूछती है कि वह इतना दुखी क्यों है। छोटा भाई उस औरत को सारी बात बता देता है। उसकी बात सुनकर वो औरत उसे एक जादुई चक्की देती है और बोलती है कि तुम इससे जो भी खाने को माँगोगे वो खाने की चीज़ ये चक्की तुम्हें दे देगी। जब तुम्हारी जरूरते पूरी हो जाएं तब तुम इस चक्की को इस लाल कपड़े से ढक देना। चक्की से सामान निकलना अपने आप बंद हो जाएगा। छोटा भाई जादुई चक्की लेकर बहुत खुश हो जाता है और सीधे अपने घर जाता है। घर पहुँच कर अपने परिवार के लिए चक्की से खूब स्वादिष्ट खाना माँगता है। चक्की से एक से बढ़ कर एक स्वादिष्ट खाना निकलता है। पूरा परिवार खुश होकर खाना खाता है और फिर सारे मिलकर सो जाते हैं। इस तरह से ऐसे कई दिन चलता रहता है। छोटा भाई अब जब चक्की से सामान निकलता उसके इस्तेमाल के बाद जो भी सामान बचता उसे बाज़ार में जाकर बेच आता। इससे अब उसके पास खूब सारा धन भी हो गया था।

 

छोटे भाई को अमीर बनते देख बड़ा भाई सोचने लगा कि आखिर अचानक ये इतना अमीर कैसे होते जा रहा। इस बात का पता लगाने के लिए वो चुपके से छोटे भाई के घर छुप जाता है और उसे जादुई चक्की से सामान निकालते देख लेता है। फिर मौका देख कर बड़ा भाई जादुई चक्की लेकर भागने लगता है। अपने साथ वो अपनी पत्नी को भी लेता है । दूसरे गावं जाने के लिए उसको नदी पार करना होता है। इसके लिए वो अपनी पत्नी के साथ नाव पर बैठता है। नाव पर बैठकर उसकी पत्नी पूछती है कि ये चक्की लेकर हम कहाँ जा रहे हैं। तभी बड़ा भाई अपनी पत्नी से कहता है की ये जादुई चक्की है। इससे जो माँगों वो चीज़ बाहर निकल आती है। ये सुनते ही उसकी पत्नी बोलती है अच्छा तो नमक निकाल कर दिखाओ। उसके बाद बड़ा भाई चक्की को नमक निकालने को कहता है। फिर बिना देरी किए चक्की नमक निकालना शुरू करती है। अब बड़े भाई ने चक्की से सामान निकालना तो सीख लिया था लेकिन उसे रोकते कैसे हैं ये नहीं देख पाया। इससे चक्की से लगातार नमक निकलता रहता है। देखते ही देखते पूरी नाव नमक से ढक जाती है  और फिर दोनों नदी में डूब जाते हैं। शायद इसलिए ये भी कहा जाता कि वो चक्की आज भी चल रही है और इसी वजह से समुन्द्र का पानी  खारा है।

   

मोरल : हमें कभी लालच नहीं करना चाहिए। लालच का फल  हमेशा बुरा ही होता है।

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समझदार बकरी और भेड़िया

Moral Story in hindi

एक बार की बात है जंगल में एक बकरी रहती थी। उसके चार बच्चे थे। बच्चों का नाम था आले, बाले, पालू और मालू। बकरी रोज घास चरने के लिए जंगल जाती थी। शाम होते ही वो जंगल से वापस भी आ जाती थी। उसने जंगल के पास ही एक छोटा सा अपना घर बना रखा था। घर लौटकर वो बड़े प्यार से अपने बच्चों को दूध पिलाती और फिर आराम से साथ सो जाती थी।

एक बार बकरी कुछ दिनों तक जंगल नहीं गई। आस-पास उसे जो भी खाने को मिलता उसी से भूख मिटाकर घर वापस चली जाती और अपने बच्चों को बहुत प्यार करती। ऐसे ही एक दिन उसने देखा कि अब आस-पास और कुछ भी नहीं बचा है। अब तो उसे जंगल जाना ही पड़ेगा। क्या करे अब वो? एक भेड़िया भी वहीं रहता था। उसे डर था कि कहीं वो जंगल जाए तो भेड़िया उसके पीछे उसके घर जाकर कहीं उसके बच्चों को ना खा ले। इस बात को लेकर बकरी बहुत परेशान थी। बहुत सोचने पर उसे एक उपाय आया। उसने अपने घर के लिये एक दरवाजा बनाया और बच्चों से कहा , आले, बाले, और मालू, ये दरवाजा बिल्कुल ना खोलना। जब मैं आऊँ, आवाज दूँ, तभी ये दरवाजा खोलना। ये सुनने के बाद चारों बच्चों ने सिर हिलाया और बकरी से कहा- हम दरवाजा ना खोले, जब तक आप हमसे ना बोलें।

बकरी अब बिना किसी परेशानी के जंगल में घास चरने के लिए चली जाती और शाम को वापस आकार बच्चों को आवाज देती, आले दरवाजा खोलो, बाले दरवाजा खोलो, पालू दरवाजा खोलो, मालू दरवाजा खोलो। बच्चे दौड़कर दरवाजा खोल देते और बहुत प्यार से माँ के गले लग जाते। इधर भेड़िया तो वहीं आस-पास घूमता रहता था। एक दिन उसने एक पेड़ के पीछे छुप कर बकरी की सारी बातें सुन ली। तभी उसने मन में सोचा, तो ये बात है। बकरी जब बुलाती है, तभी बच्चे दरवाजा खोलते हैं। एक दिन भेड़िये के पेट में चूहे कूद रहे थे। बकरी जब जंगल चली गई, तो भेड़िये ने इधर-उधर देखा और फिर पहुँच गया बकरी के घर के सामने और फिर आवज लगाई , आले दरवाज़ा खोलो, बाले दरवाज़ा खोलो, पालू दरवाज़ा खोलो, मालू दरवाज़ा खोलो। आले, बाले, पालू और मालू ने एक दूसरे की ओर देखा और कहा- माँ आज इतनी जल्दी कैसे लौट आई। फिर भी अपने नाम सुनकर उन्होंने दरवाज़ा खोल दिया। भेड़िया को देखकर बच्चें डर जाते हैं, लेकिन भेड़िया बिना देरी किए उन चारों बच्चों को पकड़ लेता है और खा लेता है।

शाम को बकरी जब घर पहुँचती है तो उसे अपना दरवाजा खुला मिलता है। बकरी डरते हुए अपने बच्चों को आवाज़ लगाती है लेकिन कोई बाहर नहीं आता। बकरी समझ जाती है कि उसके बच्चों को जरूर भेड़िये ने ही खाया होगा। पहले तो वह खूब रोती है। उसके बाद कुछ सोचकर खड़ी हो जाती है और सीधे बढ़ई के पास जाती है और उससे बोलती है कि मेरी सींगों को पैना कर दो। बढ़ई ने पूछा क्यों, उसके बाद बकरी उसको सारी बात बताती है। बढ़ई बिना देरी किए उसकी सींगों को पैना कर देता है। उसके बाद बकरी तैली के पास जाती है। तैली उसकी सींगों पर तेल लगाकर उसको चिकना कर देता है। अब बकरी भेड़िये से लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार थी। वो सीधे जंगल जाती है और भेड़िये को ढूँढने लगती है। तभी सामने बैठे हुए उसे भेड़िया दिख जाता है और वो दौड़ती हुई उसके पेट पर अपनी सींगे मारती है और भेड़िये के पेट से अपने चारों बच्चों को निकाल लेती है।

मोरल :  हमें कभी मुश्किल समय में घबराना नहीं चाहिए। हिम्मत से काम लेने पर जीत जरूर मिलती है।

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शरारती बंदर

Moral Story in Hindi

एक बार की बात है, पेड़ पर बैठकर मॉन्टी नाम का बंदर आम खा रहा था। आम खाते-खाते उसे एक शरारत करने का मन किया। वहीं पेड़ के नीचे गज्जू नाम का हाथी खड़ा था। मॉन्टी बंदर चुपके से हाथी के पीछे गया और उसकी पूंछ खीच ली। हाथी जैसे ही पीछे मुड़ा मॉन्टी बंदर उसको चिढ़ाते हुए वहाँ से भागने लगा। हाथी को मॉन्टी बंदर पर बहुत गुस्सा आया, लेकिन मॉन्टी बंदर ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए वहाँ से चला गया। आगे जाकर मॉन्टी बंदर ने देखा कि कू-कू कोयल अपनी आँख बंद कर बहुत सुरीला गाना गा रही है, तभी मॉन्टी बंदर को फिर शरारत सूझी।

 

वो धीरे से कोयल के पास गया और उसके कान में फूँक मार दी। कोयल भी मॉन्टी बंदर पर गुस्सा करती है और फिर वहाँ से उड़ कर चली जाती है। दोनों को परेशान करके मॉन्टी बंदर को बहुत मज़ा आता है। वो अकेले ही खूब जोर-जोर हँसता है। तभी मॉन्टी बंदर की नजर सामने गुलाब के फूल पर जाती है। वो अपने मन में सोचता है कि  कितना सुंदर है ये गुलाब का फूल। इसे ले जाकर वो अपनी बंदरिया को देगा। ये सोचते हुए वो गुलाब के पेड़ के पास पहुंचता है और उससे फूल तोड़ने के लिए जैसे ही अपना हाथ आगे बढ़ाता है उसे ज़ोर-ज़ोर से किसी के रोने की आवाज सुनाई देती है।

 

वो इधर-उधर देखने लगता है। तभी वो देखता है की जिस गुलाब के फूल को वो तोड़ने जा रहा था उसी फूल के गालों में मोटे-मोटे आँसू चमक रहे थे। तभी मॉन्टी बंदर ने उससे पूछा, क्या हुआ तुमको। तुम रो क्यों रहे हो। मॉन्टी बंदर की बात सुन कर फूल उससे कहता है कि तुम मुझे मत तोड़ो। मैं अपना घर नहीं छोड़ना चाहता। मुझे यहाँ रहने पर बहुत खुशी होती है। तुम जब भी मेरे पास से गुजरोगे तो मैं तुम्हें बहुत ही अच्छी खुशबू दूंगा। बस तुम मुझे छोड़ दो। गुलाब के फूल की बात सुन कर मॉन्टी बंदर को बहुत दुख होता है और वो उससे माफी माँगता है कि अबसे वो कभी भी फूल को नहीं तोड़ेगा। मॉन्टी बंदर की बात सुनकर फूल खुश हो जाता है और मुस्कुराने लगता है। फूल की खुशी देख कर मॉन्टी बंदर  को भी अच्छा लगता है और वो उसके बाद वहाँ से हस्ते-मुस्कुराते हुए अपने घर चला जाता है।  

 

 

मोरल :  हमें कभी भी ऐसी शैतानी नहीं करनी चाहिए जिससे किसी को दुख हो।  

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मैगी का गुस्सा

Moral story in Hindi

एक बार की बात है, मैगी नाम की एक छोटी लड़की थी। मैगी थी तो बहुत प्यारी बस मैगी को गुस्सा बहुत आता था। उसके गुस्से की वजह से ना ही कोई उसका कोई स्कूल में दोस्त था और ना ही कोई दोस्त घर में था। तो ऐसे ही एक दिन मैगी अपने घर में कोने पर बैठकर रो रही थी। तभी वहाँ उसके पापा आए और उन्होंने मैगी को रोते देखा। वो तुरंत मैगी के पास गए और उससे उसके रोने का कारण पूछा। पहले तो मैगी ने पापा को बताने से मना  किया फिर पापा के बार-बार पूछने पर वो बोली, पापा कोई भी मेरा दोस्त नहीं है। कोई मेरे साथ खेलना नहीं चाहता। मेरे सारे दोस्त मेरे गुस्से की वजह से मुझसे दूर भागते हैं। अब मैं क्या करूँ, मैं गुस्सा करना नहीं चाहती लेकिन फिर भी आ जाता है।

 

ऐसा बोलते हुए मैगी अपने पापा को पकड़ कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती है। मैगी की बात सुनकर मैगी के पापा उससे कहते हैं, ठीक है बेटा बस इतनी सी बात है। मैं तुम्हें एक तरकीब बताता हूँ। जिसको करने से तुम अपने गुस्से पर कंट्रोल कर सकती हो। मैगी अपने पापा की बात मान जाती और उस तरकीब के बारे में पूछती है। फिर मैगी के पापा उसे एक लकड़ी कुछ कीलें और हथोड़ी देते हैं और उससे कहते हैं कि बेटा अबसे जब भी तुम्हें गुस्सा आए तो तुम हथोड़ी से कील को इस लकड़ी पर मारना साथ ही तुम्हें जितनी ज़ोर का गुस्सा आए उतनी तेजी से हथोड़ी कील पर मारना। देखना तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा। हाँ बस एक और खास बात का ध्यान रखना है तुम्हें कि जब तक तुम्हें ना लगने लगे कि अब तुम्हारा गुस्सा शांत हो गया है तब तक एक भी कील मत निकालना। तभी मैगी पापा से फिर उस कील को निकालने के बारे मे पूछती है कि कब वो कील को निकाल सकती है।

 

उसके पापा उससे कहते हैं कि बेटा जिस दिन तुमने अपने गुस्से पर पूरी तरह से कंट्रोल कर लिया उस दिन से तुम एक-एक करके कील निकालना शुरू कर सकती हो। पापा की तरकीब मैगी को बहुत अच्छी लगती है। अब से जब भी मैगी को गुस्सा आता तो वो सीधे लकड़ी पर हथोड़ी से कील डालने लगती। उसको जितनी ज़ोर के गुस्सा आता वो उतनी ही तेजी से हथोड़ी कील पर मारती। ऐसा करते-करते कई दिन बीत गए। लकड़ी पर गुस्सा निकालते ही उसे बहुत अच्छा लगने लगा और फिर एक दिन ऐसा आया जिस दिन मैगी को बिल्कुल भी गुस्सा नहीं आया। उस दिन से वो लकड़ी से कील निकालना शुरू कर दी। फिर एक दिन उसने देखा कि उसने गुस्से मे जितनी भी कीलें लकड़ी मे डाली थी उसने वो सब निकाल ली।

 

ये बात बताने के लिए वो अपने पापा के पास गई। मैगी की खुशी देख कर उसके पापा भी बहुत खुश हुए और फिर उसे उसी लकड़ी के पास ले गए। लकड़ी को दिखाते हुए पापा उससे बोले बेटा ये कील तुम्हारे गुस्से में निकले हुए शब्द हैं और जब तुमने इन कीलों को निकाला तो तुमने सामने वाले से माफी मांगी, लेकिन बेटा ये लकड़ी में पड़े छेद देख रही हो गुस्से में जो भी तुमने बोला वो शब्द सामने वाले के दिल और दिमाग में हमेशा के लिए छेद कर गए। हो सकता है तुम्हारे माफी मांगने पर सामने वाला तुमको माफ भी कर दे लेकिन कहीं न कहीं जो तुमने उसको गुस्से मे बोला था वो उसे हमेशा याद रहे। इसलिए बेटा हमें कभी भी गुस्सा नहीं करना चाहिए। हमेशा सबसे मिल-जुल कर रहना चाहिए। मैगी अपने पापा से वायदा करती है कि अबसे वो कभी भी गुस्सा नहीं करेगी।

मोरल :  हमें गुस्सा करने से बचना चाहिए। सबके साथ अच्छे से बात करनी चाहिए

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टाटा लौटा घर की ओर 

Moral Story in Hindi

एक बार की बात है, टाटा नाम का एक लड़का था। उसकी हमेशा अपने माता-पिता से एक ही शिकायत रहती थी कि  वो उसे कहीं बाहर घुमाने नहीं ले जाते। कुछ दिनों से टाटा का मन पढ़ाई मे भी नहीं लग रहा था। वो हमेशा बस बाहर घूमने के सपने देखा करता था। तभी एक दिन टाटा बिना अपने माता-पिता को बताए चुपके से घर से निकल जाता है। उसे बाहरी दुनिया जो देखनी थी। चलते-चलते टाटा बहुत दूर एक जंगल पहुँच जाता है। अब क्योंकि टाटा के पास खाने को कुछ नहीं होता तो उसे भूख भी बहुत लगती है और इसकी वजह से वो अब अपना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा पा रहा था। उसे उसकी माँ की याद आने लगी, वो सोचने लगा कि अभी अगर वो घर में होता तो माँ कितना स्वादिष्ट खाना बना कर खिला रही होती। टाटा अपनी माँ के बारे मे सोच ही रहा था तभी उसकी नज़र सामने एक छोटे से घर पर गई।

 

जंगल में घर देख कर वो बहुत खुश हो गया। जल्दी से उस घर में पहुंच कर धीरे से उसका दरवाज़ा खोला। घर के अंदर उसे कोई नहीं दिखा। उसने आवाज़ भी दी, लेकिन कोई भी नहीं आया उसके सामने। तभी टाटा की नज़र सामने मेज़  पर गई। जिस पर 3 कटोरे रखे थे। उन कटोरों में सूप था। टाटा सूप देख कर बहुत खुश हो गया और पहले वाले कटोरे मे रखे सूप को पीना शुरू किया। लेकिन वो सूप बहुत गरम होता है इसलिए टाटा उसे नहीं पीता। फिर वो दूसरे कटोरे में रखे सूप को पीता है वो सूप बिल्कुल ठंडा होता है। उस सूप को भी नहीं पीता है। फिर वो तीसरे कटोरे में रखे सूप को पीना शुरू करता है वो उसको बहुत स्वादिष्ट लगता है क्योंकि वो ना ज्यादा ठंडा होता है और ना ही ज्यादा गरम। सूप पीने के बाद उसको सोने का मन करता है। टाटा फिर इधर-उधर देखता है कि कहीं उसे बिस्तर मिल जाए। दूसरे कमरे जाने पर उसे तीन बेड दिखाई देते हैं। टाटा सबसे पहले वाले बिस्तर मे सोने के लिए जैसे ही बैठता है वो तुरंत उठ जाता है, क्योंकि वो बेड बहुत कड़क होता। उसके बाद वो दूसरे वाले बिस्तर के पास जाता है वो भी उसे ठीक नहीं लगता क्योंकि वो बहुत मुलायम होता है अब टाटा तीसरे वाले बिस्तर पर जाता है। ये वाला बेड टाटा को बहुत अच्छा लगता है क्योंकि ये ना तो ज्यादा कड़क होता है और ना ज्यादा मुलायम। उसके बाद टाटा बेड पर लेटता है और सो जाता है।

 

तभी उस घर में तीन भालू आते हैं। तीनों घर की हालत देख कर डर जाते हैं कि पता नहीं कौन उनके घर में है। डरते-डरते तीनों दूसरे वाले कमरे में जाते हैं जहां टाटा सो रहा था। टाटा को देखते ही बेबी भालू अपने डैडी भालू और मम्मी भालू से कहता है कि मैं इसे नहीं छोड़ूँगा। इसने मेरा सूप पिया है और मेरे बेड पर भी लेटा है। बेबी भालू की आवाज सुन कर टाटा उठ जाता है और सीधे दरवाजे की तरफ भागता है। तीनों भालू उसका पीछा करते हैं लेकिन वो वहाँ से भाग जाता है और सीधे अपने घर पहुंचता है। घर पहुँच कर वो जैसे ही अपनी माँ को देखता है उनके गले लगता और माफी माँगता कि अबसे वो कभी भी घर छोड़ कर कहीं नहीं जाएगा।

मोरल:  हमें हमेशा अपने माता-पिता की बात माननी चाहिए और कभी भी अकेले घर से नहीं निकलना चाहिए।

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श्री राम जन्म कथा ( Episode-1 )

Navratri 2020

बच्चों आज से यानि नवरात्रि के पहले दिन से दशहरे तक आप सबको हर रोज रामायण से जुड़ीं कथाएं बताऊँगी। आज पहले दिन आप सुनयेंगे भगवान श्री राम के जन्म से लेकर उनके विवाह यानि शादी तक की कहानी। बच्चों आपको पता है प्रभु श्री राम को मर्यादा पुरषोत्तम भी कहा जाता है। उनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। तो चलिए शुरू करते हैं..

प्रभु राम का जन्म  

भगवान श्री राम का जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को हुआ था। इनके पिता का नाम राजा दशरथ और माता का नाम रानी कौशल्या था। भगवान श्री राम के तीन और भाई थे लक्ष्मण, शत्रुघन और भरत। लक्ष्मण, शत्रुघन जिनकी माँ थीं माता सुमित्रा और वहीं भरत माता कैकाई के पुत्र यानि बेटे थे। जब चारों भाई थोड़े बड़े हुए तो राजा दशरथ ने उन्हें पढ़ाई के लिए आश्रम भेजा। चारों भाई बहुत अच्छे से पढ़ाई पूरी करने के बाद वापस अयोध्या या गए। एक दिन राजा दशरथ ऐसे ही सभा में बैठे थे कि वहाँ महृषि विश्वामित्र आए और बोले कि राक्षसराज रावण के अनुचर मारीच और सुबाहु बहुत भयानक राक्षस है। जो उनको बहुत परेशान करतें  है। वो उन्हें यज्ञ भी नहीं करने देते हैं, इसलिए वो भगवान श्री राम को लेने आयें हैं। महृषि विश्वामित्र की बात सुनकर राजा दशरथ बड़े दंग रह जाते हैं। वो सोचते हैं कहाँ इतने छोटे प्रभु राम और कहाँ राक्षसराज रावण। उनका मन कांप उठता है। तभी राजा दशरथ ने विश्वामित्र से कहा कि वो अपने सबसे प्यारे राजदुलारे बालक श्री राम को उनके साथ नहीं भेज सकते। रावण से तो देवता भी डरते हैं। राम उनके बुढ़ापे का सहारा हैं। वे उन्हें अपने से अलग नहीं कर सकते। राजा दशरथ की बात सुनकर विश्वामित्र को गुस्सा आ जाता है और वो वहाँ से जाने लगते हैं। तभी राजगुरु वशिषठ राजा दशरथ को खूब समझते हैं और उन्हें प्रभु राम को महर्षि विश्वामित्र के साथ भेजने को मना लेते हैं। इसके बाद प्रभु श्री राम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी जातें हैं।

ताड़का का वध-

अयोध्या से सरयू के किनारे-किनारे चलते हुए राम-लक्ष्मण विश्वामित्र के पीछे-पीछे चल रहे थे। कुछ दूर चलने के बाद विश्वामित्र रुक जाते हैं और फिर राम और लक्ष्मण को मुंह-हाथ धुल कर आने को कहते हैं। जब राम-लक्ष्मण वापस आते हैं तब विश्वामित्र उन्हे बला और अतिबला के बारे में बताते हैं। इससे राक्षसी शक्ति से बचा जा सकता था। इसके बाद रात भर वहीं आराम करने के बाद अगले दिन गंगा नदी को पार करते हैं। यहाँ से बहुत घना जंगल शुरू होता है। जंगल में बहुत बड़े-बड़े जानवर भी थे। तभी विश्वामित्र ने बताया कि यहाँ ताड़का नाम कि राक्षसी रहती है। वो बहुत खतरनाक है। उसके डर से कोई भी यहाँ नहीं रहता। उसका बेटा मारीच उसके साथ रहता है। मारीच भी बहुत खतरनाक है। विश्वामित्र ने प्रभु राम से कहा कि नारी समझकर उसे छोड़ मत देना। वो दया के लायक नहीं है। इसके बाद प्रभु श्री राम ने अपना धनुष संभाला और उसकी डोर खींची उस भयानक जंगल में धनुष की आवाज से सारे जानवर घबरा गए।  ताड़का भी कांप गई। वो दौड़ती-भागती प्रभु राम के पास पहुंची और फिर लड़ने लगी।  तभी भगवान प्रभु राम ने उसे ऐसा तीर मारा की वो जमीन मे गिर गई। और फिर इस तरह से प्रभु राम ने ताड़का का अंत किया और भाई लक्ष्मण के साथ विश्वामित्र के आश्रम पहुंचे। वहाँ पहुँच कर दोनों भाई यज्ञ की रक्षा करने लगे। तभी यज्ञ के छठे दिन ताड़का का बेटा मारीच अपने साथी राक्षसों के साथ आया। वो भी प्रभु राम से खूब लड़ा लेकिन प्रभु राम ने उसको भी सबक सिखाया और फिर एक दिन आश्रम को राक्षसों के आतंक से आजाद कर दिया।

राम-सीता का विवाह-

इसके बाद विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को मिथिला मे होने वाले यज्ञ के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वहाँ शिव-धनुष है। जिसे कोई भी अकेला व्यक्ति नहीं उठा सकता। इसलिए उन्होंने राम को वहाँ जाने को कहा। प्रभु राम उनकी बात मान जाते हैं और फिर भाई लक्ष्मण के साथ मिथिला पहुंचते हैं। मिथिला के राजा जनक इन सभी को देख कर बहुत खुश होते हैं।  तभी विश्वामित्र ने राजा जनक से कहा की वो उन्हें शिव-धनुष सुनाभ दिखाने लाए हैं। फिर सभी लोग राजमहल के अंदर पहुंचते हैं जहां पर वो सुनाभ धनुष रखा हुआ था। विश्वामित्र ने राम से कहा कि आज तक इस धनुष को कोई भी नहीं उठा पाया है। राजा जनक ने ये शर्त भी रखी है की जो भी इस धनुष को उठाएगा उसी से वो अपनी बेटी सीता का विवाह यानि शादी करेंगे। इसके बाद प्रभु राम मुस्कुराते हुए धनुष के पास जाते हैं और उसे उठा लेते हैं और जैसे ही उसको तीर चलाने के लिए खीचतें हैं वो धनुष टूट जाता है और सभी लोग बस श्री राम को देखते रह जाते हैं। इसके बाद ये बात प्रभु राम के पिता राजा दशरथ तक पहुँचती है और वो बारात लेकर पाँचवे दिन मिथिला पहुंचते है और प्रभु राम को खुशी से गले लगतें हैं। और राजा जनक अपनी बेटी सीता के साथ वहाँ पहुंचते हैं और राजा दशरथ को बताते हैं की सीता उन्हें हल चलते समय जमीन के अंदर से मिली थी। अब क्योंकि प्रभु राम ने धनुष तोड़ा है इसलिए वो अपनी बड़ी बेटी सीता की शादी राम से करवाना चाहते हैं। इसके बाद प्रभु राम और माता सीता का विवाह यानि शादी होती है और हर तरफ सिर्फ खुशियों का ही माहौल रहता है।

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रामायण-सीता हरण (Episode-3) 

नवरात्रि 2020

इधर राम चित्रकूट में मंदाकनी नदी के किनारे एक पर्णकुटी बना कर रहने लगते हैं और उधर अयोध्या में राजा  दशरथ प्रभु राम के बिना बहुत दुखी हो जाते हैं और इस दुख को वो सह नहीं पाते और उनका सर्वगवास हो जाता है। भरत अपने नानी घर रहते है। फिर उन तक ये बात पहुंचाई जाती है और उनको वापस अयोध्या लाया जाता है। वापस अयोध्या आकार उनको सारी बात पता चलती है कि किस तरह से उनकी माता कैकई ने प्रभु राम को वनवास भेजा और इस बात को लेकर वो अपनी माँ पर बहुत गुस्सा करते हैं और उनसे कभी ना बात करने की बात कहते हुए राम को ढूँढने निकल जाते हैं। उनके साथ अयोध्या की सेना और माता कौशल्या और सुमित्रा भी रहती हैं। चित्रकूट जाते समय जहां-जहां राम रुके थे

 

वहाँ-वहाँ रुकते और श्री राम के बारे में पता लगाते हुए कुछ दिनों बाद राम तक पहुँच जाते हैं। प्रभु राम को देखते ही भरत उनके पैर पकड़ कर खूब रोने लगते हैं। इसके बाद  प्रभु राम उनको गले लगाते हैं। राम को अपने पिता दशरथ के बारे में पता चलता है तो वो बहुत दुखी हो जाते हैं। इसके बाद भरत उनको वापस अयोध्या साथ चलने को कहते हैं लेकिन राम नहीं मानते और फिर भरत आखिर में  उनके खड़ाऊँ लेते और चार दिन बाद वापस अयोध्या या जाते हैं। खड़ाऊँ को वो राज-सिंहासन में रखते हैं और मंत्रियों को राज्य का पूरा काम देकर खुद अयोध्या के बाहर नंदिगराम में रहने लगते हैं।

इधर भरत के जाने के बाद राम चित्रकूट से आगे दक्षिण की ओर बढ़ते हैं और अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंचते हैं। अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया थीं। वो माता सीता को ऐसा दिव्य वस्त्र यानि कपड़ा दिया जो कभी मैले यानि गंदे नहीं होते थे। उसके तीनों पूरी रात वहीं रहते हैं। सुबह होने पर प्रभु राम अत्रि ऋषि का आश्रम छोड़ते हैं और दंडक वन पहुंचते हैं। वहाँ उन्हें जीतने ऋषि-मुनि मिले सबने बताया कि यहाँ राक्षस उन सबको बहुत परेशान करते हैं। राम उन सबको भरोसा दिलाते है कि आप सब अब आराम से अपनी तपस्या करें बाकि राक्षसों को मैं संभाल लूँगा। फिर तीनों आगे की ओर बढ़ते हैं और आगे बहुत घना जंगल मिलता है। तभी अचानक एक बहुत बड़ा विराध नाम का राक्षस उनके सामने आ जाता है। फिर राम और लक्ष्मण उसका हाथ मोड़ते हैं और जिंदा जमीन में गाड़ देते हैं। इस तरह से 10 साल प्रभु राम वहीं दंडक वन में रहते और हर ऋषि-मुनियों की राक्षसों से रक्षा करते हैं। इसके बाद वे दोबारा सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम पहुंचें इन्होंने ही प्रभु राम को दंडक वन के बारे में बताया था। इसके बाद सुतीक्ष्ण मुनि राम को अगस्त्य ऋषि के पास भेजते हैं। 

 

अगस्त्य ऋषि सुतीक्ष्ण मुनि के गुरु थे। इसके बाद वे तीनों अगस्त्य ऋषि से मिलते हैं और राम को विष्णु भगवान का महाधनुष, ब्रह्म जी से मिला अमोघ बान, इन्द्र से मिला बाणों से हमेशा भरा रहने वाला तरकश और सोने का खडग दिया। इसके बाद अगस्त्य ऋषि ने राम को वनवास के बाकि बचे दिन पंचवटी में रह कर बिताने को कहा। पंचवटी गोदावरी नदी के किनारे बहुत ही सुंदर जगह थी। पंचवटी के रास्ते जाते समय प्रभु राम को एक बहुत बड़ा गिद्ध मिला। उसका नाम जटायु था। जटायु राज्य दशरथ का दोस्त था। इसलिए उनसे मिलकर प्रभु राम बहुत खुश ही जाते हैं और फिर पंचवटी के लिए आगे निलकते हैं। पंचवटी में तीनों को रहते हुए 3 साल बीत चुके थे। तभी रक दिन शूर्पणखा नाम की राक्षसनी वहाँ आई। वो राम की सुंदरता बस देखती रह गई। वो बस किसी तरह प्रभु राम को पाना चाहती थी। इसके लिए उसने एक बहुत सुंदर औरत के रूप में खुद को बदल लिया और और राम के पास जाकर उनसे शादी की बात करने लगी। राम ने लक्ष्मण के पास भेजा। लक्ष्मण ने फिर राम के पास भेजा। इसतरह से बार दोनों भाइयों के परेशान करने की वजह से वो माता सीता पर हमला करती है, इससे लक्ष्मण को गुस्सा आ जाता है और वो उसकी नाक और कान काट देते हैं। नाक-कान कटते ही शूर्पणखा फिरसे राक्षसी बन जाती है और वहाँ से भाग कर रावण के सौतेले भाई खर और दूषण के पास पहुँचती हैं। ये दोनों राक्षस वहीं रहते थे। शूर्पणखा की हालत देख कर दोनों को गुस्सा या जाता है और एक-एक कर प्रभु राम से लड़ते हैं। राम उन दोनों राक्षसों सहित 14 हज़ार राक्षसों को मारते हैं और पंचवटी को राक्षसों के आतंक से मुक्त करते हैं।

खर और दूषण के मरने के बाद शूर्पणखा लंका अपने भाई रावण के पास जाती है और उनको राम-सीता के बारे में बताती है। रावण बहुत वीर था। उसने कुबेर को हरा कर पुष्पक विमान भी छीन लिया था। शूर्पणखा की पूरी बात सुनकर रावण को बहुत गुस्सा आ जाता है और सीता को हरण यानि उन्हें उठाने का मन बनाता है। इसके लिए वो उसी मारीच राक्षस के पास पहुंचता है जिसे प्रभु राम ने मार कर भगाया था। पहले तो मारीच रावण को ऐसा करने से मना करता है, उनसे कहता है कि राम बहुत शक्ति-साली है उनसे मत लड़ो। लेकिन जब देखता है कि रावण नहीं मान रहा तो हिरण बनने को तैयार हो जाता है। सोने जैसे हिरण को देख कर माता सीता प्रभु राम से उसे लाने को कहती हैं। पहले तो राम को लगता कि जरूर कहीं न कहीं इसमे कोई राक्षसी शक्ति है लेकिन सीता का मन रखने के लिए उसस हिरण को पकड़ने निकल जाते हैं और लक्ष्मण को माता सीता की रक्षा करने को कहते हैं।

 

जैसे ही प्रभु राम हिरण पर तीर चलाते हैं हिरण बोलते  है- है सीते, भाई लक्ष्मण मुझे बचाओ। माता सीता को लगता है कि प्रभु राम खतरे में है इसलिए वो लक्ष्मण को उनके पास भेजती हैं। लक्ष्मण जाते समय माता सीता की कुटिया के बाहर एक लक्ष्मण रेखा खीचते हैं और उनसे उस रेखा के बाहर नहीं निकलने को कह कर राम को बचाने जाते हैं। फिर रावण ब्राह्मण का वेष बना कर माता सीता के पास पहुंचता है और धोखे से उन्हें लक्ष्मण रेखा के बाहर निकलवा कर उन्हें पकड़ लेता है और पुष्पक विमान में बैठाकर उड़ने लगता है। रास्ते में उसे जटायु मिलता है। वो सीता माता को बचाने के लिए रावण से खूब लड़ता है लेकिन रावण उसके पंख काट कर नीचे गिरा देता है। इसके बाद रावण और तेजी से रथ को उड़ाने लगता है। सीता माता को एक पर्वत पर बैठे हुए कुछ बंदर दिखाई देते हैं वो उन्हे जल्दी से अपने जेवर निकाल कर उन्हें दे देती हैं। इसके बाद रावण लंका पहुंचता है और सीता माता को अपना विशाल बहुत बड़ा महल दिखाता है और उनसे रानी बनने को कहता है । लेकिन सीता माता उसकी किसी भी बात को नहीं मानती फिर रावण उन्हें अशोक वाटिका में बंदी बना लेता है माता सीता से कहता है कि अगर एक साल के अंदर माता सीता ने अपना निर्णय नहीं बदल तो वो उनका वध कर देगा।

इधर राम मारीच का वध कर के लौटे तो उन्हें रास्ते में लक्ष्मण मिले। राम समझ गए जरूर सीता खतरे में है। वो दौड़ते-भागते हुए अपनी कुटिया पहुंचे।

 

माता सीता को बहुत आवाज दी। लेकिन माता सीता उन्हें कहीं नहीं मिली। प्रभु राम बहुत दुखी हो गए और माता सीता के लिए रोने लगे। इसके बाद भाई लक्ष्मण के साथ सीता को खोजने निकले। रास्ते में उन्हें घायल जटायु मिला। जटायु ने राम को रावण के बारे में बताया कि वो माता सीता को उठा कर ले गया है। इतना कहने के बाद जटायु अपना शरीर छोड़ देता है। इसके बाद प्रभु राम आगे बढ़ते हैं और उन्हें कबंध नाम का राक्षस मिलता है। जिसका सिर नहीं होता। उसको श्राप मिला था। तो राम उसे श्राप से मुक्त कराते हैं और फिर वो राम को ऋष्यमूक पर्वत पर जाकर सुग्रीव से मिलने को कहते हैं। इसके बाद राम आगे बढ़ते हैं और पंपा नाम के सरोवर के किनारे मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचते हैं। वहाँ उन्हें सबरी मिलती है। वो उन्हें अपना झूठा बेर खिलाती है और माता सीता को खोजने के लिए सुग्रीव से मिलने की सलह देती है।

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रामायण- ​बालि वध (Episode-4)

Navratri 2020

बच्चों आज नवरात्रि के चौथे दिन मैं आपको बताने जा रही हूँ प्रभु राम कैसे सुग्रीव से मिले और क्यों उन्होंने बालि का वध किया।  

कबंध नाम के राक्षस को मार कर राम आगे बढ़े और पंपा नाम के सरोवर के किनारे मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचते हैं। वहाँ उन्हें सबरी मिलती है। वो उन्हें अपना झूठा बेर खिलाती है और माता सीता को खोजने के लिए सुग्रीव से मिलने की सलह देती है। वसंत का मौसम आ चुका था। प्रभु राम धीरे-धीरे ऋषयमूक पर्वत की ओर बढ़ते जा रहे थे, सुग्रीव अपने बड़े भाई बालि के डर से ऋषयमूक पर्वत पर रहते थे। मतंग ऋषि ने बालि को श्राप दिया था इसी श्राप की वजह से बालि ऋषयमूक पर्वत नहीं जाते थे। एक दिन सुग्रीव ने दो लोगों को उधर आते देखा। उसने सोचा दोनों कहीं बालि के गुप्तचर न हों। उन्होंने हनुमान जी को उनके पास भेजा। हनुमान जी अपना भेष बदलकर उन दोनों के पास जाते हैं। हनुमान जी संस्कृत में प्रभु राम से उनके बारे में पूछते हैं। फिर हनुमान उन्हें अपने बारे में बताते है कि मेरा नाम हनुमान है। सुग्रीव पंपापुर के राजा बालि के छोटे भाई हैं और उन्होनें मुझे आपके पास भेजा है। इसके बाद लक्ष्मण उन्हें माता सीता के बारे में बताते हैं।

 

हनुमान जी प्रभु राम और लक्ष्मण को अपने कंधे में बैठाकर ऋषयमूक पर्वत सुग्रीव से मिलवाने ले जाते हैं। इसके बाद प्रभु राम और सुग्रीव एक दूसरे से मिलते हैं और सुग्रीव प्रभु राम को माता सीता को खोजने का भरोसा देते हैं साथ ही सुग्रीव प्रभु राम को माता सीता के वो जेवर भी देते हैं जो उन्होंने बंदरों को दिए थे। राम सुग्रीव से यहाँ छुप कर रहने का कारण पूछा तो सुग्रीव ने बताया कि किषिकंधा नरेश बालि मेरा बड़ा भाई है। उसने मेरी पत्नी को छीन लिया है। वो मुझे मारना चाहते हैं। उन्हीं से बच कर मैं यहाँ छिपा रहता हूँ। बालि ने दुंदुभि राक्षस को भी बड़े आराम से मार दिया था। बालि का वध सिर्फ वही कर सकता है जो एक ही तीर से सामने खड़े शाल के सातों पेड़ों को बेध सकें। तभी प्रभु राम ने तत्क्षण तीर से सामने लगे सातों पेड़ों को बेध डाला। सुग्रीव राम की वीरता देख कर दंग रह जाते हैं और ये भी समझ जाते है कि प्रभु राम बालि का वध कर सकते हैं। इसके बाद प्रभु राम सुग्रीव से बालि को युद्ध के लिए बुलाने को कहते हैं और उनसे ये भी कहते है कि वो पेड़ के पीछे रहकर बालि पर तीर चला देंगे। प्रभु राम की बात सुनकर सुग्रीव बालि के पास जाकर उसे ललकारते हैं। बालि गुस्से में लड़ने आ जाते हैं। दोनों के बीच खूब लड़ाई होती है। और बालि सुग्रीव को इतना मारते हैं कि वो बस किसी तरह अपनी जान बचाकर ऋषयमूक पर्वत तक पहुँच पाते हैं। बालि युद्ध जीतने के बाद वापस अपने महल चले जाते हैं।

 

इधर सुग्रीव को राम पर बहुत गुस्सा आता है। वो राम से कहते है कि अगर आपको बालि का वध करना नहीं था तो मुझे मार खाने के लिए क्यों भेज दिया। प्रभु राम ने जैसे ही अपना हाथ सुग्रीव पर फेरा सुग्रीव के शरीर का सारा दर्द चला गया। फिर राम ने उन्हें समझाया कि आप दोनों भाइयों में इतनी समानता है कि मैं आपको पहचान ही नहीं सका। अगर भूलवश आप पर तीर चला देता तो सोचए क्या होता है। इसके बाद राम सुग्रीव को नागपुष्पी माला देते हैं। जिसे पहन कर दोबारा सुग्रीव बालि से लड़ने जाते हैं। बालि अपनी पत्नी तारा के पास बैठे थे। भाई को लड़ाई के लिए बुलाते सुन बालि जाने लगते हैं तभी तारा उन्हें समझाती है कि इसके पीछे जरूर कोई बात है, क्योंकि सुग्रीव इतनी जल्दी आपसे लड़ने नहीं आएंगे। अंगद ने बताया था कि अयोध्या के राजकुमार राम और लक्ष्मण इस ओर आयें हैं। राम बहुत बलशाली और धार्मिक विचारों के हैं। आप राम से दोस्ती कर लिजीए। बालि ने तारा की बातों में ध्यान ना देते हुए कहा कि अगर राम धार्मिक विचारों के हैं तो वो मुझे क्यों मारेंगे और जहां तक सुग्रीव का सवाल है तो मैं उसका वध नहीं करूंगा। इतना कह कर बालि दोबारा सुग्रीव से लड़ने चले जाते हैं। बालि सुग्रीव को बहुत मारते हैं, जब सुग्रीव के मुंह से खून निकलने लगता है तब राम पेड़ के पीछे से बालि पर तीर चलाते हैं। तीर बालि के सीने में लगता है और बालि घायल होकर जमीन में गिर जाते हैं। राम बालि के पास पहुंचते हैं, तब बालि उनसे कहते हैं कि हे राम, मेरी आपसे कोई लड़ाई नहीं थी। मैंने आपके खिलाफ कोई काम भी नहीं किया। फिर आपने मुझे क्यों मारा? अगर आपको अपने बल पर इतना ही अभिमान था तो मुझसे आमने-सामने युद्ध करते। छिपकर तो कायर करते हैं। आपने सुग्रीव से दोस्ती माता सीता को लाने के लिए की है। अगर आप मुझसे दोस्ती करतें तो मैं एक दिन माता सीता को ले आता। फिर राम कहते हैं कि तुम धर्म की बातें करते अच्छे नहीं लगते। तुमने अपने छोटे भाई की पत्नी रुमा को अपनी पत्नी बना लिया। मैंने दोस्ती निभाने के लिए तुम्हें पेड़ के पीछे से मारा है क्योंकि तुम्हारा आचरण जानवर समान था। जानवर को ओट से यानि छिप कर ही मारा जाता है।

इसके बाद बालि सुग्रीव की पत्नी का हरण करने के लिए प्रभु राम से माफी माँगते हैं और राम से तारा और अंगद का ध्यान रखने को कहते है। बालि के घायल होने की खबर सुन कर तारा रोते हुए बालि के पास पहुँचती है फिर बालि तारा और अंगद को समझाते हैं। सुग्रीव को अपने गले की माला पहनाते हैं और उनसे किषिकंधा का राज संभालने और तारा और अंगद का खयाल रखने को कहते हैं। इसके बाद बालि का स्वर्गवास हो जाता है और प्रभु राम सुग्रीव को किषिकंधा का राज्य संभालने और अंगद को युवराज बनाने को कहते हैं। अब क्योंकि बारिश का मौसम आ चुका था इसलिए प्रभु राम प्रस्रवण पर्वत पर आराम करने सुग्रीव से ये कहते हुए जाते है कि वो बारिश का मौसम बीत जाने के बाद यहाँ आए ताकि माता सीता को खोजा जा सके।

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रामायण-सुंदर कांड (Episode-5)

Navratri 2020

बच्चों कल मैंने आपको प्रभु राम का सुग्रीव से मिलना और बालि वध के बारे में बताया था। आज मैं आपको बताऊँगी सुंदर कांड। इसमें कैसे हनुमान जी लंका तक पहुंचते हैं और माता सीता से मिलते है साथ ही किस तरह से वो रावण की लंका का दहन करते हैं उसके बारे में बताऊँगी। तो चलये शुरू करते हैं।

प्रभु राम बारिश के मौसम के खत्म होने का इंतजार कर रहे थे। ताकि जल्दी सुग्रीव उनके पास अपनी वानर सेना लेकर आए और वो लंका जाकर माता सीता को वापस ला सके। इधर सुग्रीव को जैसे ही राज्यगद्दी मिलती है तो वो मदिरा का सेवन करने लगता है और उसे प्रभु राम को दिया अपना वायदा भी याद नहीं रहता। हनुमान भी उन्हें याद दिलाते हैं लेकिन तब भी वह कोई ध्यान नहीं देते। शरद ऋतु आ जाती है। सुग्रीव की तरफ से कोई भी खबर नहीं मिलने पर प्रभु राम को गुस्सा आ जाता है और वो लक्ष्मण को सुग्रीव के पास किषिकंधा जाने को कहते हैं। लक्ष्मण गुस्से में किषिकंधा पहुंचते हैं। लक्ष्मण के गुस्से से सुग्रीव डर जाते हैं और फिर उनसे माफी मांगते हैं। साथ ही हनुमान से सभी वानरों को दस दिन के अंदर बुलाने का आदेश देते हैं।

 

प्रस्रवन पर्वत पर लाखों वानर एकत्र होते हैं। जामवंत के साथ सैंकड़ों भालू भी पर्वत पहुंचते हैं। सुग्रीव प्रभु राम के पैर पकड़ कर माफी मांगते हैं और फिर इतनी सारी सेना देख कर प्रभु राम को संतुष्टि मिलती है कि अब वो सीता का पता लगा लेंगे। सुग्रीव सीता को खोजने की योजना बनाते हैं। वानरों के चार दल बनाते हैं। सबको चारों दिशाओ में भेजते हैं। दक्षिण की तरफ जाने वाली सेना अंगद ने संभाली। इसमे हनुमान, नल, नील और जामवंत भी थे। सभी दलों को एक-एक महीने के अंदर पता लगाकर वापस लौटने को कहा गया। दक्षिण दिशा के दल को छोड़ कर बाकि सारे दल समय से पहले ही लौट आए। उन्हें आगे जाने का कोई भी रास्ता नहीं मिला। लेकिन दक्षिण की ओर गया दल समुन्द्र किनारे पहुँच जाता है। अब समुन्द्र के आगे कैसे जाए यही सोच कर सारी वानर सेन वहीं बैठ जाती है। तभी वानरों की नजर एक पर्वत पर बैठे बहुत बड़े गिद्ध पर जाती है। वो जटायु का बड़ा भाई संपाति था। इतने बड़े गिद्ध को देख सभी वानर डर जाते हैं। फिर हनुमान उनके पास जाते हैं और जटायु के बार में बताते है कि किस तरह उसने माता सीता को रावण से बचाने के लिए उससे लड़ाई की और प्रभु राम के लिए अपने प्राण त्याग दिए। जटायु के बारे में सुनकर संपाति को बहुत दुख होता है और वो बताता है कि उसने रावण को माता सीता को ले जाते देखा है। साथ ही ये भी कहता है कि जो समुद्र की दक्षिण दिशा से समुद्र को पार कर लेगा वो सीता का पता लगा लेगा।

इसके बाद सभी वानर समुद्र के दक्षिण किनारे पहुंचते हैं। लेकिन समुन्द्र की लहरे इतनी ऊंची-ऊंची उठ रही थी कि कोई भी वानर उसको चाह कर भी पार नहीं कर पा रहा था। तब जामवंत ने हनुमान को उनकी शक्ति याद दिलाई और कहा- हे वीर हनुमान, तुम्हीं इतने बड़े समुन्द्र को पार कर सकते हो। तुम तो पवन पुत्र हो। इसके बाद हनुमान जी अपना शरीर पर्वत जितना बड़ा करते हैं और महेंद्र पर्वत पहुंचते हैं। महेंद्र पर्वत पर खड़े होकर हनुमान अपने पिता को याद कर छलांग लगाते हैं और लंका की और बढ़ते हैं। हनुमान के ताकत की परीक्षा लेने के लिए उनके सामने नागों की माता सुरसा आती हैं। हनुमान उनसे आगे की ओर जाने देने को कहते हैं लेकिन वो अपना बड़ा स मुँह खोल कर खड़ी हो जाती है। इसके बाद हनुमान भी अपना शरीर बढ़ाते जाते हैं। जैसे-जैसे सुरसा मुंह बड़ा करती वैसे-वैसे हनुमान अपना शरीर बढाते जाते। तभी अचानक हनुमान अपना शरीर बहुत छोटा कर लेते हैं और तेजी से सुरसा के मुंह में जाकर वापस बाहर आ जाते हैं। इसके बाद वो हनुमान को आगे का रास्ता देतीं हैं और साथ ही काम पूरा होने का आशीर्वाद भी। हनुमान आगे बढ़ते हैं तभी उनको सिंहिका नाम की राक्षसी मिलती है। वो उड़ते हुए पक्षियों की पानी में पड़ने वाली परछाई को पकड़ लेती थी। उसने हनुमान की परछाई को भी पकड़ लिया। हनुमान खिंचते हुए सिंहिका के पास पहुंचे। वो उन्हें खाने जा ही रही थी कि तभी हनुमान ने उस पर वार किया और उसके प्राण निकल गए। समुन्द्र पार के हनुमान लंका पहुंचे। लंका सोने की तरह चमक रही थी। रात होने पर हनुमान जी बिल्ली जैसे छोटे हो गए और लंका के अंदर जाकर सीता को ढूँढने लगे। रावण के महल के अंदर गए। रावण सो रहा था। फिर अंतःपुर में सोई रावण की पत्नी मंदोदरी के कमरे गए। उन्हें लगा कि ये माता सीता हैं। फिर उन्हें ध्यान आया कि माता सीता ऐसे आराम से तो नहीं सो सकती।

 

इसके बाद वो अशोक वाटिका की तरफ जाते हैं। वहाँ जाकर वो पेड़ पर बैठ जाते हैं। तभी हनुमान देखते हैं कि बहुत सी राक्षसनी किसी को घेरे खड़ीं हैं। हनुमान जी बड़े ध्यान से देखते हैं तो उन्हें रोती हुई माता सीता दिखाई देती हैं। वो दूर से माता सीता को प्रणाम करते हैं और मिलने का मौका ढूंढते हैं। सुबह होती है। रावण अशोक वाटिका सीता से मिलने आता है और उनसे कहता है मैंने तुम्हें एक साल का समय दिया था। इसमे अब दो महीने ही बचे हैं। अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी तो मैं चंद्रहास तलवार से तुम्हारा सिर काट दूंगा। और गुस्से में पैर पटकते वहाँ से चला जाता है। फिर मौका देख कर हनुमान माता सीता के पास आते हैं और उन्हे प्रभु राम के बारे में बताते हैं और ये भी कहते हैं कि आपके बारे में पता लगते ही प्रभु राम बहुत जल्द लंका पर हमला करेंगे। हनुमान की बात सुनकर सीता उन्हें श्री राम को देने के लिए अपने हाथ से उतारकर चूड़ामणि देती हैं। इसके बाद हनुमान जी माता सीता से विदा लेते हैं।

माता सीता के मिलने से हनुमान जी बहुत खुश थे। अब वो रावण की ताकत का पता लगाना चाहते थे। उन्होंने सबसे पहले अशोक वाटिका मे लगे पेड़ों को उखाड़ना शुरू किया और भूख लगने पर फल तोड़ कर खाने लगते। जब वाटिका के रक्षक उन्हें रोकने आए तो उन्हे हनुमान ने मार-मार कर भगा दिया। फिर ये रक्षक रावण के पास हनुमान की शिकायत लेकर जाते हैं। रावण पहले कुछ सैनिकों को हनुमान को मारने के लिए भेजते हैं। हनुमान उनको भी मार देते हैं। फिर रावण अपने बेटे अक्षय को भेजते हैं। हनुमान उसको भी मार देते हैं। इससे रावण को गुस्सा आ जाता है। फिर वो अपने बड़े बेटे मेघनाद को भेजते हैं। मेघनाद ब्रह्म-अस्त्र चलाकर हनुमान को बांध देते हैं और रावण के सामने ले आते हैं। फिर हनुमान उन्हें अपने आने का कारण बताते हैं और कहते हैं कि आप सीता को लौटा दें। राम की शक्ति को तो आप जानते ही हैं। ये सुन कर रावण को गुस्सा आ जाता है और वो हनुमान को मारने का आदेश देते हैं। रावण के छोटे भाई विभीषण उन्हें समझाते हैं कि हनुमान तो दूत हैं और दूत को मारना गलत है। इसे छोड़ दे। रावण विभीषण की बात मान जाता है और फिर अपने सैनिकों को आदेश देता है कि हनुमान की पूंछ में आग लगा कर पूरे नगर में घुमाओ और जब पूंछ जल जाए तब इसे छोड़ देना। जब ये बिना पूंछ के लौटेगा तब इसके स्वामी को मेरी ताकत के बारे में पता चलेगा। फिर राक्षसों ने हनुमान की पूंछ में कपड़े बांधे। उन्हें गलियों मे घुमाया जाने लगा। उनके पीछे-पीछे सभी लोग हँसते-हँसते उनका मज़ाक उड़ाते चलने लगे। कोई उन पर कंकड़ फेकता तो कोई पत्थर। कोई तालियाँ बजाता तो कोई चिढ़ाता। पूरे नगर में घुमाने के बाद उनकी पूंछ में आग लगा दी गई।

 

आग लगते ही हनुमान जी अपने शरीर को छोटा किया और राक्षसों के हाथों से छूट गए। फिर हनुमान जी ने सबसे पहले नगर-द्वार में आग लगाई। फिर एक घर से दूसरे घर पर छलांग लगाते हुए सबमें आग लगाने लगें। देखते ही देखते पूरी लंका में हर तरफ कोहराम मच गया। चारों ओर आग की लपटें उठने लगी। लंका का सोना समुन्द्र में गिरने लगा।

लंका के एक-एक घर को जलाने के बाद हनुमान समुन्द्र में छलांग लगाकर पूंछ में लगी आग बुझाते हैं। फिर वो सीता जी की कुशलता पूछने जाते हैं। उन्हें चिंता होती है कि  कहीं अशोक वाटिका में में भी आग की लपटें न पहुँच गई हों। अचानक उन्होंने अपनी पूंछ देखी। उसका बाल तक नहीं जला था। वे निश्चिंत हो जाते हैं फिर माता सीता के पास पहुंचते हैं और उनसे चिंता ना करने के लिए कहते हैं साथ ही ये भी कहते हैं कि वो बहुत जल्द श्री राम के साथ वापस आएंगे।

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​रामायण-विभीषण मिलन और लंका  के लिए समुन्द्र पर पुल निर्माण 

(Episode-6)

बच्चों कल मैंने आपको बताया लंका दहन के बारे में। आज नवरात्रि के छठे दिन सुनिए हनुमान का वापस श्री राम तक पहुंचना, लंका के लिए वानर सेना का निकलना और समुन्द्र में पुल बनाना साथ ही राम की शरण में विभीषण का जाना। तो चलिए शुरू करते हैं।

अरिष्ट पर्वत पर चढ़कर हनुमान ने शेर की तरह आवाज़ निकली। इसके बाद छलांग लगाई और उड़ चले। हनुमान जी की आवाज समुन्द्र के उस पार तक जा पहुंची जहां नल, नील जामवंत और अंगद उनका इंतजार कर रहे थे। हनुमान की आवाज सुन कर सब चौक जाते हैं और हनुमान के आने का इंतजार करने लगते हैं। उसके बाद श्री राम और सुग्रीव की जयकार करते हुए हनुमान उनके सामने उतरते हैं। सभी वानर उन्हें घेर कर बैठ जाते हैं और लंका के बारे में पूछने लगते हैं। इसके बाद अंगद जल्द किषिकंधा चलने को कहते हुए श्री राम से मिलने निकल पड़ते हैं। रास्ते में उन्हें सुग्रीव का उपवन यानि बगीचा दिखाई दिया। सभी को भूख लगी थी। अंगद ने सबको खाने का आदेश दिया और फिर वानरों ने फल खाया, भालू ने शहद पिया। मधुवन नाम के उस उपवन की देखभाल सुग्रीव के मामा दधिमुख करते थे। उन्होंने तुरंत सुग्रीव को ये बताया कि यहाँ बहुत सारे वानर आ गए हैं जो पूरा मधुवन खराब कर रहे हैं। सुग्रीव समझ जाते हैं की वानर सेना ने सीता का पता लगा लिया है। वो दधिमुख से उन्हें अपने पास भेजने को कहते हैं।

सुग्रीव खुश होकर श्री राम को सीता के पता लगने की खबर सुनाते हैं। हनुमान की वीरता और चालाकी से खुश होकर श्री राम उन्हें अपने गले लगा लेते हैं। सीता के बारे में सुन कर पहले तो उन्हें बहुत राहत मिलती है लेकिन बाद में उनकी दशा सुनकर दुखी हो जाते हैं। इसके बाद हनुमान श्री राम को माता सीता की दी हुई चूड़ामणि देते हैं। उसे देख श्री राम के आँसू आ जाते हैं। श्री राम से शादी के समय राजा जनक ने सीता को यह चूड़ामणि पहनाया था। बार-बार श्री राम बस सीता के बारे में पूछे जा रहे थे। फिर हनुमान ने उनसे कहा कि सीता जी को लाने के लिए अब हम सबको तैयारी करनी चाहिए। क्योंकि रावण ने उन्हें दो महीने का समय दिया है। दो महीने बाद रावण उन्हें मार देगा। राम सुग्रीव को तुरंत युद्ध की तैयारी करने को कहते हैं। उस दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र था। सीता का जन्म इसी नक्षत्र में हुआ था। इसलिए प्रभु राम को ये शुभ मुहूर्त लगत है और वो युद्ध के लिए निकलने को कहते हैं। सुग्रीव की आज्ञा पाकर सेनापति नील सेना को आगे चलने का आदेश देते हैं। हनुमान जी श्री राम को अपने कंधे में बैठाते हैं और अंगद लक्ष्मण को। खूब सारे जंगल और पहाड़ों को पार करते हुए सभी महेंद्र पर्वत पहुंचते हैं। इसके बाद सुग्रीव सबको आराम करने के लिए कहते हैं।

इधर लंका में रहने वाले लोगों को ये पता चल जाता है कि श्री राम की सेना महेंद्र पर्वत तक आ गई है। सभी डरने लगते है क्योंकि उन्हें हनुमान द्वारा लंका जलाना याद आ जाता है। विभीषण फिर से रावण को समझाने उनके पास जाते हैं और उनसे श्री राम से दुश्मनी ना लेने को कहते हैं।  साथ ही ये भी कहते है कि वो सीता को लौटा दे। इसी में ही सभी लंकवासियों की भलाई है। रावण विभीषण की बात नहीं मानते हैं और फिर अपने सारे पुत्रों और सेनापति को बुलाते हैं। सब रावण की हाँ में हाँ भरते है कि सीता को नहीं लौटाना चाहिए। तभी विभीषण फिर से बोलते है कि एक हनुमान को तो हम पकड़ नहीं सके तो फिर इतने बलशाली राम का मुकाबला कैसे करेंगे। विभीषण की बातों से रावण को गुस्सा या जाता है और वो विभीषण को अपने राज्य से निकाल देता है। उसके बाद विभीषण अपने चार मंत्रियों के साथ राम से मिलने निकल जाते हैं। राम की सेना के पास पहुँच कर विभीषण उन्हें अपने बारे में बताते हैं। फिर हनुमान उन्हें श्री राम से मिलवाते हैं। विभीषण उन्हें रावण के बारे में सारी बात बताते है और ये भी कहते हैं कि क्यों रावण ने उन्हें लंका से बाहर निकल दिया। इसके बाद विभीषण राम को कुंभकर्ण, मेघनाद, प्रहस्त के बारे में बताते हैं। रावण से तो देवता भी डर से काँपते हैं। उसने यमराज तक को बंदी बना लिया था। मेरे भाई कुंभकर्ण की ताकत से सभी लोग भाग खड़े होते हैं। रावण का पुत्र मेघनाद ने तो स्वर्ग के राजा इन्द्र को पराजित कर दिया था। उसे इसलिए इंद्रजीत भी कहा जाता है। रावण तपस्वी भी है। उसने अपने तप के बल से ब्रह्म और शिव से वरदान लिया है। उसे केवल बल से ही हराना मुश्किल है। वभीषण की बात सुनने के बाद राम लक्ष्मण से समुन्द्र का जल मंगाते हैं और विभीषण का राजतिलक करते हुए कहते हैं कि मैं तुम्हें लंका का राजा घोषित करता हूँ। मैं वचन देता हूँ कि रावण और उसके साथियों को युद्ध में हरा दूंगा और तुम लंका पर शासन करोगे। वभीषण श्री राम के चरण-स्पर्श करते हैं और उन्हें युद्ध में पूरी सहायता करने की कसम खाते हैं।

 

लंका पहुचने के लिए समुन्द्र को पार करना जरूरी था। राम समुन्द्र किनारे बैठ जाते हैं। वो समुन्द्र से रास्ता देने की प्रथना करते हैं। श्री राम तीन दिनों तक बैठकर प्रार्थना करते हैं। जब समुन्द्र पर प्रार्थना का कोई असर नहीं होता है तो श्री राम को गुस्सा आ जाता है और वो गुस्से में उस पर तीर चलाने के लिए जैसे ही धनुष उठाते है और तीर चढ़ाते हैं तभी समुन्द्र की लहरें तेजी से लहराने लगती है। और उसमे से एक व्यक्ति बाहर आता है। फिर प्रभु राम से माफी माँगता है और उनसे कहता है कि नल समुन्द्र में पुल बनाने की कला जानता है। उसे आप सेतु बनाने का आदेश दीजीए। धनुष में चढ़ाए तीर को आप उत्तर की तरफ चलाए। वहाँ अधर्मी लोग रहते हैं। राम उत्तर दिशा में तीर चलते हैं और फिर सभी दुष्ट लोग मारे जाते हैं और वो जगह रेतीला हो जाती है।नल की योजना के मुताबिक समुन्द्र पर पुल बनने लगा। वानर समुन्द्र में पत्थर, चट्टानें फेंकने लगे। दिन-रात काम होने लगा। और फिर पाँचवे दिन सेतु बन गया। सारी वानर सेना ने पुल पार किया। लंका में जाकर श्री राम  सुबेल पर्वत पर रुके और फिर वो वभीषण और सुग्रीव के साथ युद्ध की योजना बनाने लगे।

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रामायण-कुंभकर्ण वध

(Episode-7)  Navratri-2020

बच्चों कल मैंने आपको रावण के भाई विभीषण का श्री राम से मिलन, वानर सेना द्वारा समुन्द्र पर पुल बनाना और श्री राम का वानर सेना के साथ लंका पहुंचना और सुबेल पर्वत पर रुकना बताया था। आज आपको युद्ध की शुरुआत और कुंभकर्ण के वध के बारे में बताऊँगी। तो चलिए शुरू करते हैं।  

जब श्री राम लंका पहुंचकर सुबेल पर्वत में रुकते है तो रावण को बहुत आश्चर्य होता है। रावण ने सपने में भी नहीं सोचा था की समुद्र पर पुल बनाया जा सकता है। उसके मन में राम का डर बैठ गया। उसने अपने दो मंत्रियों शुक  और सारण को राम की सैन्य शक्ति का पता लगाने भेजा। शुक और सारण अपना रूप बदलना बहुत अच्छे से जानते थे। उन्होंने वानर रूप धारण किया और राम की सेना जहां-जहां रुकी थी वो जगह देखने लगे।  विभीषण उन्हें पहचान गए और पकड़ कर राम के पास ले आए। इसके बाद दोनों गुप्त चरो ने अपने सही नाम बताएं और आने का कारण भी बताया।  श्रीराम ने उनसे कहा कि अगर और जानकारी चाहते हो तो पूछ लो, मैं कल से लंका पर बाणों की वर्षा कर दूंगा। रावण से जाकर कह देना। फिर प्रभु राम उन्हें छोड़ देते हैं। शुक और सारण श्री राम को प्रणाम करते हैं और लंका वापस लौट कर आ जाते हैं। इसके बाद दोनों रावण के सामने राम की प्रशंसा के पुल बांध लग जाते हैं।  रावण उन्हें राम की सेना के प्रमुख वीर दिखाने को कहते हैं। तब दोनों रावण के साथ महल के सबसे ऊंची जगह पर जाते हैं और सारण परिचय देना शुरू करते हैं।  वो वीर जो बहुत तेज गर्जना कर रहा है वह सुग्रीव का सेनापति नील है। वह टेढ़ी आंखें करके जम्हाई लेने वाला अंगद है।  अंगद के पीछे नल है इसी ने समुद्र पर पुल बनाया है। रीछों के बीच में खड़ा बूढ़ा जामवंत है। हनुमान को तो आप जानते ही हैं। वो हाथी सी मस्त चाल में आ रहा हनुमान है।  हनुमान के साथ ही बैठे हुए राम है। वे धनुष विद्या में बहुत निपुण है।  उनके साथ विभीषण बैठे हैं।  राम ने उन्हें लंका का राजा बना दिया है।  राम और विभीषण के बीच सुग्रीव बैठे हैं।  सारण ने रावण को समझाया कि ऐसे शक्तिशाली वीरों को हराना आसान नहीं है इसलिए सीता को लौटा देना चाहिए। शुक ने भी सारण की बात का समर्थन किया तो रावण उन पर बरस पड़ा। इसके बाद रावण अपने महल चला जाता है।  मंदोदरी ने भी उसे समझाया कि अभी भी युद्ध रोका जा सकता है।  सीता को लौटाना सभी के हित में है।  रावण अपने हठ पर अड़ा रहता है और सेना को युद्ध के लिए तैयार करने का आदेश देता है।

राम ने युद्ध की रणनीति बनाई और सेना को चार भागों में बांटा।  लंका की चार दीवारों पर किस तरह आक्रमण करना है उसके बारे में बताया। राम ने रात को सुबेल पर्वत पर चढ़कर लंका की स्थिति को समझा था। सुबह होने पर लंका को चारों ओर से घेर लिया गया।  राम युद्ध से पहले शांति बनाने की कोशिश करते हैं और इसके लिए वो अंगद को लंका जाने का आदेश देते हैं। वो अंगद से कहते है कि रावण को समझाना सीता को वापस कर देना पर युद्ध टाला जा सकता है नहीं तो युद्ध होगा। और फिर इसमें रावण के वंश का कोई भी नहीं बच पाएगा। अंगद रावण की सभा में पहुंचते हैं। वो अपना परिचय देते हुए रावण से कहते हैं कि आप मेरे पिता के मित्र थे मैं इस नाते आपको समझाने आया हूं।  रावण अंगद को भड़काकर अपनी और करने की कोशिश करता है। उसने कहा कि राम ने तुम्हारे पिता का वध किया है तो तुम मेरी तरफ आ जाओ तो मैं राम को मार कर तुम्हारे पिता के वध का बदला ले लूंगा।  अंगद रावण की बातों में नहीं आते हैं। वो रावण को बार-बार समझाते भी हैं। लेकिन रावण नहीं समझता और रावण गुस्से में उठ कर अंगद को मारने का आदेश देता है। अंगद रावण के सैनिकों को मारते  हैं और कूदकर महल से बाहर आ जाते हैं। अंगद की शांति बनाने की कोशिश असफल होने पर राम लंका पर आक्रमण करने का आदेश देते हैं और इसके बाद वानर सेना चारों दीवारों पर आक्रमण कर देती है। लंका के उत्तरी द्वार पर बहुत तेज आक्रमण किया जाता है। इस ओर से सेना को सुग्रीव, जामवंत, विभीषण और खुद राम लक्ष्मण देख रहे थे।  वानर सेना को जवाब देने के लिए रावण ने द्वार खोलने का आदेश दिया। रावण की सेना जैसे ही बाहर निकली तो वानरों ने उन पर पत्थरों और पेड़ों की बारिश कर दी।  वानर राक्षसों को पकड़ पकड़ कर मारने लगे।  राक्षस भी वानरों पर तलवारें लेकर टूट पड़े। और फिर दोनों तरफ कई सैनिक मारे गए।

 

जब शाम हुई तब रावण की ओर से उसके बेटे मेघनाद ने वानर सेना पर भयंकर आक्रमण कर दिया। अंगद ने मेघनाथ के रथ गिरा दिया।  उसका साथी भी मारा गया। रथ टूट जाने के बाद मेघनाथ ने खुद को गायब कर लिया और आक्रमण करने लगा।  उसके बाणों से वानर सेना मारी जाने लगी। उसने राम-लक्ष्मण पर नाग-बाण  छोड़े। बाण लगते ही राम और लक्ष्मण बेहोश होकर गिर गए। वानर सेना में हाहाकार मचने लगा। विजई मेघनाद  रावण के पास जाता है और उसे राम-लक्ष्मण के मारे जाने की खबर सुनाता है। रावण खुश होकर मेघनाथ को गले से लगा लेता है। रावण के आदेश से राक्षसियाँ सीता को युद्ध वाली जगह ले जाती है. राम और लक्ष्मण को मृत समझकर सीता रोने लगती है। तभी त्रिजटा राक्षसी सीता को समझाती है कि राम और लक्ष्मण केवल बेहोश हुए हैं।  दुखी माता सीता विमान में बैठकर वापस अशोक वाटिका लौट जाती हैं।  राम लक्ष्मण की हालत देख सुग्रीव रो पड़ते हैं। विभीषण सुग्रीव को धैर्य बंधाया और समझाया।  कुछ समय बाद राम सही हो जाते हैं।  लक्ष्मण को देखकर राम रोने लगते हैं । भाई की हालत से वो बहुत परेशान हो जाते हैं। वह दुखी होकर अपने आपको अपने प्राण त्यागने की बात करने लगे वानरों में मेघनाथ का इतना आतंक बैठ जाता है कि वह विभीषण को आता देखकर उसे मेघनाथ समझ बैठेते हैं। फिर जामवंत वानरों को समझाते हैं।  राम की दशा देखकर विभीषण उन्हें युद्ध क्षेत्र में वीर की तरह व्यवहार करने के बारे में समझते हैं। और कहते है कि आप पूरी सेना के मार्गदर्शक हैं आपको धैर्य रखना चाहिए। लक्ष्मण जल्द ही स्वस्थ हो जाएंगे। वैद्यराज सुषेण ने भी समझाया कि संजीवनी विशल्यकरणी औषधियों को लेते ही लक्ष्मण तुरंत ठीक हो जाएंगे। तभी पक्षीराज गरुड़ वहां आ जाते हैं। वो राम लक्ष्मण को तुरंत नागों के बंधन से मुक्त कर देते हैं। राम लक्ष्मण के घाव भी भर जाते हैं।  और वह पहले की तरह स्वस्थ हो जाते हैं। राम लक्ष्मण को स्वस्थ देखकर राम की सेना में खुशी की लहर दौड़ने लगती है।  रावण को जब फिर से उनके स्वस्थ होने की खबर मिलती है तो वो दोबारा अपने वीरों को युद्ध करने के लिए भेजता है।  और फिर इस युद्ध में रावण के सभी लोग मारे जाते हैं।

इन वीरों के मारे जाने से रावण परेशान हो जाता है और वो अपने सेनापति प्रहस्त को भेजता है। उसमें और नील में बहुत भयानक लड़ाई होती है। और फिर नील प्रहस्त पर एक चट्टान फेंकता है और  वो उसमें दब कर मर जाता है।

सेनापति प्रहस्त के मारे जाने से रावण को बहुत बड़ी चोट पहुँचती है और वह गुस्सा होकर खुद युद्ध करने चला जाता है। उसके साथ मेघनाथ, अतिकाय और नरानतक जैसे राक्षस योद्धा थे। रावण के क्रोध के आगे वानर सेना टिक ही नहीं पा रही थी। सुग्रीव घायल होकर बेहोश हो जाते हैं। वानरों की यह दशा देख लक्ष्मण राम से युद्ध में जाने की इजाजत मांगते हैं। राम हनुमान और बाकी बलशाली वानरों को लक्ष्मण के साथ जाने का आदेश देते हैं। रावण और हनुमान आमने-सामने लड़ने लगते हैं। हनुमान के मुक्के की चोट से रावण कांप उठता है। तब रावण लक्ष्मण पर बाण चलाने लगता है। पहले तो लक्ष्मण घबरा जाते हैं लेकिन बहुत जल्द संभलते हैं और अब वो ओर  तेजी से बाण रावण पर चलाने लगते हैं।  रावण का शरीर बाण से बंद जाता है। रावण को लगता है कि अगर ऐसा ही रहा तो लक्ष्मण से उसे मार डालेंगे। फिर रावण लक्ष्मण पर ब्रह्म शक्ति का इस्तेमाल करता है और लक्ष्मण बेहोश होकर नीचे गिर पड़ते हैं। रावण उन्हें लंका ले जाने के लिए उठाने लगता है।  हनुमान तुरंत आते हैं और रावण को मारना शुरू करते हैं। हनुमान की मार से रावण बेहोश होकर नीचे गिर जाता है। हनुमान लक्ष्मण को उठाकर राम के पास पहुंचते हैं। कुछ समय बाद लक्ष्मण को होश आता है और वो उठ कर बैठ जाते हैं। इसके थोड़ी देर बाद ही रावण को भी होश आ जाता है और वो फिर से युद्ध करना शुरू कर देता है। श्री राम हनुमान के कंधे पर बैठकर रावण पर तीर चलाने लगते हैं। रावण का रथ टूट जाता है। उसका मुकुट दूर गिरता है। बिना रथ और मुकुट के रावण पर श्री राम को दया आ जाती है और वो उसे छोड़ देते हैं। साथ ही रावण से यह भी कहते हैं कि कल नए रथ पर फिर से तैयार होकर युद्ध करने आना। रावण को अपनी ऐसी हालत पर बहुत शर्म आती है और दुखी होकर लंका वापस लौट जाता है।   

 

रावण चिंता में राम से हार का बदला लेने के लिए परेशान हो जाता है।  उसे अब तो राम की शक्ति का भी पता चल चुका था। सेनापति प्रहस्त सहित लंका के अनेक महायोद्धा मारे जा चुके थे।  राम ने उसे जिस प्रकार अपमानित करके छोड़ दिया था उससे वो ओर परेशान था।  उसे अपने छोटे भाई कुंभकरण की याद आई। उसे लगा महाबली कुंभकरण राम पर विजय पा लेगा। कुंभकरण का शरीर पर्वत के समान था।  वह 6 महीने के बाद 1 दिन के लिए जागता था। फिर खा पीकर सो जाता था। रावण ने उसके खाने के लिए खूब सारा समान भेजा। सारे राक्षस मिलकर उसे उठाने में लग गए। उसके कानों के पास बाजे बजाने लगे। भयंकर शोर किया। उसके बाल खींचे। लेकिन कुंभकरण की नींद नहीं टूटी। आखिर में उस पर हाथी चढ़ाया गया तब जाकर कुंभकर्ण की नींद खुली। नींद से जगते ही कुंभकरण ने चिल्लाना शुरू किया। राक्षस उससे डर जाते है। उसे खूब सर खाना खाने को दिया जाता है। फिर कुंभकर्ण खुद को उठाने का कारण पूछता है। तब राक्षस उससे कहते है कि लंकापति रावण ने उसे याद किया है। झूमता कुंभकरण रावण के पास पहुंचने रावण के चरण स्पर्श करता है और जगाने का कारण पूछा।  फिर रावण उसको सारी बात बताता है उससे कहता है कि अब राम को तुम ही हरा सकते हो।  तुम्हारे बिना मेरा कौन है। कुंभकरण को रावण की बात सुनकर हंसी आ जाती है। और उससे कहता है कि बुरे कर्मों का फल तो तुम्हें अब  भोगना ही पड़ेगा। रावण फिर कुंभकर्ण से कहता है कि भाई अब जो हो गया है उसे तो बदला नहीं जा सकता। इस संकट से तुम ही बचा सकते हो। कुंभकरण को रावण की ऐसी हालत पर तरस आ जाती है और वो रावण को भरोसा दिलाता है कि वो राम लक्ष्मण को मार देगा।  रावण की चिंता दूर हो जाती है। उसे कुंभकरण की वीरता पर भरोसा था।  कुंभकरण युद्ध क्षेत्र में पहुंचता है। उसके हाँथ में त्रिशूल होता है। उसे देखते ही वानर सेना डर जाती है और भाग खड़ीं होती है। अंगद भागते हुए वानरों को रोकतें हैं। वानर कुंभकर्ण पर बड़े-बड़े पेड़ फेंकते है। उस पर  इन सबका कोई असर नहीं होता।  तभी कुंभकर्ण हनुमान पर त्रिशूल फेंकता है और वो हनुमान जी के सीने से खून निकलने लगता है। हनुमान को घायल देख कर वानर बचाओ-बचाओ कहते हुए भाग खड़े होते हैं।

 

आगे बढ़ते कुंभकरण को रोकना मुश्किल लग रहा था।  वह वानर वीरों का मारता घायल करता आगे बढ़ता जा रहा था। अंगद ने कुंभकरण पर आक्रमण किया उसने उसके सीने पर मारा। कुछ समय के लिए कुंभकर्ण थोड़ा रुका उसके बाद उसने अपने वार से सुग्रीव और अंगद दोनों को बेहोश कर दिया।  इसके बाद उसने सुग्रीव को बगल में दबाया और लंका की ओर चल पड़ा।  सुग्रीव को होश आया तो उसने अपने तीखे दांतो और नाखून उसे कुंभकरण की सीना फाड़ दिया। उसने गुस्से में आकार सुग्रीव को नीचे गिरा दिया और फिर सुग्रीव वहाँ से तेजी से भागे। हनुमान, अंगद और सुग्रीव की हालत देख कर लक्ष्मण कुंभकर्ण से युद्ध करने लगे। उस पर उन्होंने तीरों की बारिश कर दी। लक्ष्मण की वीरता से कुंभकर्ण बहुत प्रभावित हुआ। उसने लक्ष्मण की तारीफ करते हुए कहा कि तुम्हारे जैसे वीर का सामना कर के मुझे बहुत खुशी हुई। अब मैं तुमसे नहीं राम से लड़ना चाहता हूँ। मुझे बताओ राम कहां है। राम युद्ध के लिए तैयार खड़े थे।  लक्ष्मण ने कुंभकरण को उस दिशा में भेज दिया।  राम और कुंभकरण के बीच बहुत भयानक युद्ध होने लगा। राम ने कुंभकरण पर तीर चलाए।  कुंभकरण का दाहिना हाथ कट गया। दूसरी तीर से उसकी बायाँ हाथ काट दिया। दोनों हाथ कट जाने पर कुंभकर्ण गुस्सा होकर राम को खाने दौड़ा।  उसने मुंह फाड़ रखा था। तभी राम ने तीर  चलाकर उसकी दोनों पैर काट दिए। कुंभकरण वहीं गिर गया। उसके बाद राम ने तीर चलाकर उसका सिर काटा और फिर कुंभकर्ण के प्राण निकल गए। कुंभकर्ण के खत्म होते ही चारों तरफ श्री राम जय जयकार होने लगी।

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रामायण-मेघनाद वध 

रावण कुंभकरण की वजह से बहुत दुखी था। वह बेहोश हो जाता है।  होश आने पर रोने लगता है।  कुंभकरण उसका बहुत बड़ा सहारा था। वह उसका दाहिना हाथ था। कुंभकरण को याद कर बस रावण रोते ही जा रहा था।  उसे लगा कि मानो लंका अनाथ हो गई हो। दुखी रावण रोते ही जा रहा था।  उसके बेटों ने आज तक रावण की ऐसी हालत नहीं देखी थी।  तभी त्रिशला, देवांतक, नरानतक जैसे रावण के बेटे उसे हिम्मत बनाने आते हैं और उसे कहते हैं कि अभी हम जीवित हैं हमारे रहते आप बिल्कुल चिंता ना करें।  हम राम, लक्ष्मण को पकड़कर आपके चरणों में गिरा देंगे। बेटों की बात सुनकर रावण उन्हें आशीर्वाद देता है और युद्ध के लिए भेजता है।

रावण ने अपने भाइयों महाकौशल और महोदय को भी भेजा। नरान्तक और अंगद में युद्ध होने लगा। नरान्तक ने अंगद पर भाले से मारा।  भाले के टूट जाने पर दोनों में मल्लयुद्ध होने लगा। नरान्तक ने अंगद को ऐसा भाला  मारा कि अंगद बेहोश हो गया फिर वापस होश आ जाने पर अंगद नरान्तक पर फिर से टूट पड़ा।  अंगद ने उसकी छाती पर इतनी तेज से घुसा मारा किनारा तक नहीं ढेर हो गया। नरान्तक का अंत देखकर देवांश, महोदय और त्रिसरा ने अन्य राक्षसों के साथ अंगद पर आक्रमण कर दिया।  वह सभी अंगद को घेर कर उस पर प्रहार करने लगे। नील और हनुमान अंगद को घिरा देखकर उसकी सहायता के लिए वहां पहुँच जाते हैं।  नील फिर महोदय को मारते हैं हनुमान के पहाड़ों से देवांतक और त्रिशरा मारे जाते हैं।  ऋषभ नाम के वानर ने महापाशर्व का वध किया।

अतिकाय अपने नाम के मुताबिक पर्वत के आकार जैसा राक्षस था। वह वानरों पर टूट पड़ा. ब्रह्मा से प्राप्त शक्तियों से उसके पास बहुत सारी शक्तियां थी। उसके विशाल रूप को देखकर वानरों ने सोचा कि कुंभकरण जिंदा होकर आ गया है और वह डर से भाग खड़े हुए। लक्ष्मण उसे युद्ध के लिए ललकाराते हैं। अतिकाय ने कहा तुम अभी बच्चे हो मैं राम से युद्ध करने आया हूं। इतना कहकर वह राम को ललकारने लगा.  लक्ष्मण ने उस पर बाण चलाकर कहा पहले बालक से ही युद्ध कर लो.  अतिकाय ने दिव्य कवच पहना हुआ था लक्ष्मण के बाण उससे टकराकर वापस आने लगे। लक्ष्मण को गुस्सा आने लगा और उन्होंने उसके सारथी सहित रथ को खत्म कर दिया। अतिकाय को बहुत गुस्सा आने लगा उसने लक्ष्मण पर वाणों की झड़ी लगा दी।  लक्ष्मण बुरी तरह घायल हो गए।  फिर लक्ष्मण संभल संभल कर अतिकाय पर अमोघ बाण चलाने लगे। सभी बार प्रभावहीन हुए तभी लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा। अतिकाय का सिर कट गया.  अतिकाय को मरते देख कर सैनिक भागकर लंका लौट गए।  लक्ष्मण की विजय से वानर उनकी जय-जयकार करने लगे। अपने बेटे और संबंधियों संबंधियों को मारे जाने से रावण बहुत दुखी था। वह अपनी हार समझने लगा था उसका संसार के प्रति भी कोई मोने था उसके मन से राज्य के प्रति भी चला गया था और उसके मन में सीता के प्रति भी कोई आकर्षण नहीं था।

रावण को दुखी देख मेघनाथ उसे समझाने लगते हैं और अपने पिता को आश्वस्त करते हैं कि वह लक्ष्मण को मार देगा.  उसके बाद वह अपने पिता से निश्चिंत हो जाने को कहते हैं.  रावण अपने बड़े पुत्र मेघनाथ की शक्ति से जानता था.  पुत्रों की बात नहीं उसके मन में आशा की नई किरण जगह दी थी.  उसने सैनिकों को इकट्ठा किया और फिर नगर के द्वारों की रक्षा के लिए उसने अतिरिक्त सुरक्षा उपाय कराएं।  सीता पर और कड़ा पहरा बिठा दिया।  इसके बाद मेघनाथ युद्ध के लिए चल पड़ता है।  अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित मेघनाथ की उपस्थिति से राष्ट्र सेना में नया जोश आ गया।  वह वानर सेना पर टूट पड़े।  मेघनाद ने बाणों की वर्षा की जिससे वह घायल हो गए. वानरों ने पेड़ों और पत्थर फेंकना शुरू किया मेघनाथ अपने वाणों से उन्हें काट देता।  मेघनाथ मायावी था।  युद्ध करने वालों को दिखाई नहीं दे रहा था।  उसने लक्ष्मण पर वाहनों की तेज प्रहार किए.  उसने ब्रह्मास्त्र चला कर लक्ष्मण को बेहोश कर दिया.  उन्हें उसी अवस्था में छोड़कर फिर वह वापस लंका लौट गया।  लक्ष्मण को बेहोश देखकर वानर सेना में खलबली मच गई।  विभीषण ने चिंतित वानरों को समझाया।  विभीषण जामवंत के पास पहुंचे।  जामवंत ने हनुमान की कुशलता पूछी।  उनसे कहा कि अगर हनुमान जीवित हैं तो हम सभी जीवित हैं।  हनुमान जावंत के पास आए।  जामवंत ने उन्हें कैलाश पर्वत से जड़ी बूटियां लाने को कहा।  मृतसंजीवनी विशल्यकर्णी और संधानी नामक जड़ी बूटियों की पहचान बताते हुए जामवंत ने कहा कि यह पर्वत पर चमक रही होंगी।  इनके प्रयोग से लक्ष्मण की बेहोशी दूर हो जाएगी और घायल वानरों के घाव भर जाएंगे।  हनुमान तुरंत कैलाश पर्वत की ओर चले वहां पहुंचकर बंद द्वारा बताइए जड़ी बूटियों पहचान ना सके इसलिए वह कैलाश पर्वत उठा लाए। और इन जड़ी-बूटियों की गंध से ही लक्ष्मण ठीक हो जाते हैं और घायल वानर सेना भी स्वस्थ हो जाते हैं। वानर सेना ने रात के समय लंका में प्रवेश किया।  उन्होंने रावण के सैनिकों पर भयंकर आक्रमण कर दिया राक्षस प्राण बचाकर इधर-उधर भागने लगे। वानरों ने रावण के हाथियों और और घोड़ों के रहने की स्थानों में आग लगा दी। उन्होंने लंका के घर-घर को जला डाला।  चारों ओर से आग की लपटें निकलने लगी।  लंका को तहस-नहस कर वानर सेना वापस लौट आई।  सुबह मकराक्ष के नेतृत्व में राक्षस लड़ने आए। मकराक्ष खर का पुत्र था।  उसने राम पर आक्रमण किया।  राम ने अग्निबाण छोड़ कर उसे मार डाला।  तब रावण मेघनाथ का युद्ध करने भेजा।

 

 मेघनाथ युद्ध करने से पहले देवी-देवताओ को खुश करने के लिए यज्ञ-शाला गया।  उसने यज्ञ करके देव दानों का आशीर्वाद लिया।  वह युद्ध की जगह पहुंचा और अदृश्य होकर राम की सेना पर बाण बरसाने लगा।  उसने राम और लक्ष्मण को भी घायल कर दिया।  लक्ष्मण उसे ब्रह्म-अस्त्र द्वारा मारना चाहते थे।  राम ने ऐसा नहीं करने का आदेश दिया।  मेघनाथ वापस लौट गया और वह बहुत जल्दी लौट आया।  उसके साथ सीता बैठी हुई थी।  उसने हनुमान के सामने सीता को जतारा और उसका सिर काट दिया। सीता के वध से राम लक्ष्मण एकदम परेशान हो गए।  दोनों रोने लग गए।  विभीषण ने उन्हें समझाया कि वह वास्तविकता नहीं थी।  वह तो मेघनाथ की माया थी। मेघनाद लंका जाकर निकुंभीला देवी के मंदिर उन्हें खुश करने के लिए साधना करने लगा।  विभीषण ने राम से कहा कि अगर मेघनाथ को यज्ञ का फल मिल गया उसे कोई भी नहीं मार सकेगा इसलिए उसे यज्ञ पूरा करने से रोकना होगा।  राम के आदेश लक्ष्मण विभीषण के साथ चल पड़े और वानरों और भालू ने लंका में प्रवेश करना शुरू किया और राक्षसों को मारना शुरू किया। राक्षसों को मरता देख विभीषण देवी की उपासना छोड़कर उनको बचाने चल पड़ा। जिस रास्ते मेघनाद को आना था उस रास्ते को विभीषण जानता था। फिर वह वहाँ पहुँच कर लक्ष्मण के साथ मेघनाथ का इंतजार करने लगा। विभीषण के वहां से गुजरने पर दोनों ने उसका रास्ता रोक लिया। विभीषण को गुस्सा आ गया उसने मेघनाद से कहा  आपने लक्ष्मण को यहाँ लाकरदेशद्रोही की भूमिका निभाई है।

 

लक्ष्मण को  इस जगह के बारे में कैसे पता चल सकता था।  आप मेरे पिता के छोटे भाई हैं। लंका आपकी भूमि है। लंका आपकी भी है आप यहीं पर पले बढ़े हैं। अपने और पराए में अंतर होता है दूसरे चाहे जितने अच्छे हो, बड़े हो, श्रेष्ठ हो वह अपने नहीं हो सकते।  आपके इस देशद्रोही लंका कभी भी माफ नहीं करेगी। इतना कहकर मेघनाद को  गुस्सा आ जाता है और दुखी मेघनाद ने लक्ष्मण पर तीरों की वर्षा कर दी।  लक्ष्मण भी उतनी ही तेजी से चलाने लगे।  विभीषण चिल्ला-चिल्ला कर लक्ष्मण और वानर सेना को उत्तेजित करने लगा।  लक्ष्मण मेघनाथ पर प्रहार करने लगा।  उसने मेघनाथ का कवच का तोड़ डाला।  मेघनाथ ने लक्ष्मण का कवच काट दिया। मेघनाद को विभीषण पर गुस्सा आने लगा।  उसने विभीषण पर प्रहार किया। लक्ष्मण ने उसे मार्ग में ही नष्ट कर दिया.  लक्ष्मण ने उसे मारने का अच्छा मौका देखा फिर विश्वामित्र द्वारा दिए गए बरं-अस्त्र को छोड़कर लक्ष्मण ने मेघनाथ का सिर काट डाला। राम ने लक्ष्मण से कहा लंका पर विजय निश्चित है।  दुनिया के सबसे बड़े योद्धा को तुमने मार गिराया है

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​रावण वध -रामायण 

मेघनाद के वध के बाद रावण का गुस्सा भड़क उठता है।  बेटे के जाने की दुखी खबर को भुला कर वह अपनी बची हुई राक्षस सेना को तैयार करता है।  रावण बस गुस्से में तम तम आ रहा था।  युद्ध के लिए जाते समय रावण के साथ बहुत सारे अपशगुन भी होते हैं। घोड़ों के पैर फिसलने लगे, रावण के रथ पर गिद्ध मंडराने लगे,  उसकी बाईं भुजा फड़कने लगी, लेकिन रावण इन सब के बारे में बिना कुछ सोचे युद्ध करने पहुंच जाता है।  युद्ध वाली जगह में पहुंचते ही रावण का गुस्सा वानर सेना पर टूट पड़ता है।  चारों ओर वानर कटकट कर गिरने लगते हैं। कोई भी रावण का सामना करने का साहस नहीं जुटा पाता।  तभी सुग्रीव वहां आते हैं और सारे वानरों को उत्साहित करते हैं राक्षस सेना के बाकी सारे लोग वानर वीरों से लड़ने लगते हैं और फिर इसी बीच सुग्रीव और विरुपाक्ष में युद्ध होने लगता है और इसमें सुग्रीव विरुपाक्ष को हरा देते हैं और उसका वध कर देते हैं।  अब बस रावण अकेला बचता है अब उसके गुस्से की ओर भी कोई सीमा नहीं रहती।  वह बस वानर सेना को मारे जा रहा था।  वानर सेना को खत्म होते देख राम रावण से लड़ने लगते हैं।  दोनों में भयंकर बाण युद्ध होने लगता है। तभी विभीषण और लक्ष्मण भी राम के पास आकर रावण से लड़ने लगते हैं।  विभीषण रावण के रथ के घोड़ों और उसके सारथी का वध करते हैं।  विभीषण को देखते ही रावण को और गुस्सा आ जाता है।  वह गुस्से में लाल हो जाता है।  उसकी भुजाएं विभीषण का वध करने के लिए फड़कने लगती हैं। तभी वह विभीषण पर बहुत तेज शक्ति बाण छोड़ता है। लेकिन वह बाण विभीषण को नहीं लगता। हां अगर विभीषण को वह बाण लग जाता तो उसकी मृत्यु निश्चित थी। 

 

रावण ने जो विभीषण पर तीर छोड़ा था उसे लक्ष्मण ने ही काटा था।  गुस्से में आकर रावण विभीषण पर दिव्य शक्तियों वाला बाण चलाता है।  तभी लक्ष्मण विभीषण को तेजी से अपने पीछे छुपा लेते हैं और वह बाण लक्ष्मण को लग जाता है और वह बेहोश होकर नीचे गिर पड़ते हैं।  राम तुरंत लक्ष्मण को संभालते हैं और उनके सीने से वह तीर निकाल लेते हैं।  इसी बीच रावण को मौका मिल जाता है और वह राम पर तीर चलाता है।  जिससे राम घायल हो जाते हैं।  घायल राम को बहुत गुस्सा आ जाता है।  वह गुस्से में आग बबूला हो जाते हैं।  फिर वह लक्ष्मण को देखने के लिए हनुमान और सुग्रीव से कहते हैं और खुद रावण को ललकारते हैं।  राम गुस्से में रावण से कहते हैं,  हे रावण अब कोई तुम्हें नहीं बचा सकता।  तुम मेरे हाथों मारे जाओगे आज तुम्हारे पापों का अंत होगा और पुण्य की जीत होगी। आज धरती तुम्हारे अंधकार से निकलकर प्रकाशमय हो जाएगी। आज अंधकार पर प्रकाश की और पाप पर पुण्य की विजय होगी आज देवता और ऋषि मुनि तुम्हारे आतंक से मुक्ति पाएंगे इसके बाद राम वानर सेना को पर्वत शिखरों पर जाकर रावण के साथ होने वाले युद्ध को देखने के लिए कहते हैं।  प्रभु राम उनसे कहते हैं कि ऐसा युद्ध ना तुमने देखा होगा और ना ही भविष्य में देख सकोगे।  राम का आदेश पाकर वानर पर्वत शिखरों पर चले जाते हैं, तभी सुषेण लक्ष्मण को संजीवनी बूटी सुँघाते हैं।  जिसे हनुमान लेकर आए थे संजीवनी सुँघते ही लक्ष्मण ठीक हो जाते हैं।  उनके घाव भर जाते हैं।  जब राम को लक्ष्मण के ठीक होने की खबर मिलती है तो वह निश्चिंत हो जाते हैं और इसके बाद वह रावण पर बाढ़ वर्षा करने लगते हैं।

 देवराज इंद्र रावण को सभी सुविधाओं से भरे हुए रथ में युद्ध करते हुए देखकर परेशान हो जाते हैं।  क्योंकि राम के पास रथ नहीं था।  फिर वह राम को अपना रथ भेजते हैं।  इंद्र का सारथी मातली रथ लेकर श्री राम के पास पहुंचता है।  इस रथ में खूब सारे अर्थ शस्त्र होते हैं। इसमें इंद्र का अमोक कवच भी होता है साथ ही एक बहुत बड़ा धनुष और खूब सारी शक्तियों वाले बाण होते हैं।  फिर राम इसी रथ में सवार होकर युद्ध करने लगते हैं।  राम और रावण के बीच बहुत भयानक होता है और इसी बीच रावण राम को घायल कर देते हैं।  घायल राम को देखकर रावण खुश हो जाता है और वह राम पर शूल फेकता है।  राम अपने बाणों से उसे नहीं रोक पाते हैं।  उसके बाद राम इंद्र द्वारा भेजे रथ में से शक्तियां निकालना शुरू करते हैं और फूल की तरह चला देते हैं उस शक्ति से शूल के टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं।  उसके बाद राम रावण पर तेज बाण चलाते हैं। यह बाण उसके सीने और सिर पर लगता है।  रावण घायल हो जाता है लेकिन वह लड़ाई करना बंद नहीं करता वह तीर चलाता रहता है इसी बीच रावण थक जाता है रावण का सारथी उसकी यह हालत समझ जाता है और वह रावण को लंका वापस ले जाता है

: रावण ठीक होते ही सारथी पर बिगड़ने लगता है फिर सारथी उसे समझाता है, तो रावण मान जाता है।  इसके बाद रावण फिर से तैयार होकर युद्ध के लिए जाता है।  एक बार फिर से राम और रावण के रथ एक दूसरे की आमने सामने आ जाते हैं।  राम इंद्र का धनुष उठाते हैं और वह उससे रावण पर प्रहार करने लगते हैं रावण पर अपने बाणों का कोई असर ना होते देख राम परेशान हो जाते हैं।  तभी राम का सारथी राम से कहता है कि आप रावण को ब्रह्म अस्त्र से ही मार सकते हैं इसलिए आप उसे चलाकर रावण का अंत करिए।  राम को मिताली की बात सही लगती है फिर वह अगस्त्य ऋषि के बाण को धनुष पर चढ़ाते हैं।  अगस्त ऋषि को यह बाण ब्रह्मा जी से मिला था फिर राम वह अचूक बाण रावण के सीने में मारते हैं।  रावण के सीने को चीर कर बाण राम के तरकश में वापस आ जाता है। बाण लगते ही रावण का अंत हो जाता है। उसके मरते ही वानर सेना श्री राम की जय जयकार करने लगती है। उनकी आवाज से धरती और आकाश को गूंज उठते हैं। देवी- देवताओं की खुशी का ठिकाना नहीं रहता।  वह राम पर फूलों की वर्षा करते हैं।  वानर राम को घेर लेते हैं। लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव, विभीषण, अंगद, नल, नील, जामवंत और अपलक राम को देखने लगते हैं।  इस जीत की खुशी में सभी लोग बहुत खुश होते हैं। तभी रावण के वध से उसका भाई विभीषण दुखी हो जाता है और वह रावण के शरीर के पास जाकर रोने लगता है और कहता है कि भाई मैंने आपको समझाया था कि राम से दुश्मनी ना ले। आपने मेरा कहना नहीं माना इसी वजह से आपकी यह हालत हुई है।  आप के डर से यमराज तक कापता था।  आपको देखकर देवता छिप जाते थे। 

 

आपके वध से राक्षस वंश समाप्त हो गया है।  फिर राम विभीषण के पास आते हैं और उसको समझाने लगते हैं।  उसे रावण के वध पर दुखी ना होने के लिए कहते हैं क्योंकि रावण वीरों की तरह लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ है।  रावण के वध की खबर पाकर मंदोदरी के साथ रावण की अन्य पत्नियां उसके पास आकर रोने लगती हैं मंदोदरी जोर-जोर से रो रही थी उसकी हालत देखकर सबकी आंखें भर आती हैं।  श्री राम मंदोदरी को भी समझाते हैं. फिर इसके बाद राम मातली को शुक्रिया कहते हैं और मातलि इंद्र का रथ लेकर वापस लौट जाता है।  उसके बाद राम सुग्रीव को गले लगाते हैं और वानर भालू से भी मिलते हैं।  इन सबके बाद राम-लक्ष्मण से कहते हैं कि वह लंका जाकर विभीषण का राज्य अभिषेक करें।  लक्ष्मण राम की आज्ञा पाकर लंका चले जाते हैं और फिर विभीषण का राज्य अभिषेक कर वापस राम के पास लौट आते हैं।  विभीषण भी उनके साथ रहते हैं विभीषण के आने पर राम हनुमान से कहते हैं।  हे,  हनुमान महाराजा विभीषण की अनुमति लेकर अशोक वाटिका जाओ सीता को युद्ध के परिणाम के बारे में बताओ।  सीता जो कुछ कहें वह आकर मुझे बताओ।  विभीषण की अनुमति लेकर हनुमान उसी समय अशोक वाटिका जाकर सीता माता को यह बात बताते हैं सीता माता हनुमान से कहती है कि वह तुरंत राम के पास जाना चाहती हैं और यह बात फिर हनुमान राम को बताते हैं। और फिर सीता माता खूब सुंदर तैयार होकर प्रभु राम के पास आती है प्रभु राम को देखकर सीता माता रोने लगती हैं श्री राम की भी यही हालत होती है।

और इसी के साथ प्रभु राम के वनवास के 14 वर्ष भी पूरे होते हैं और फिर वह सभी के साथ पुष्पक विमान में बैठकर वापस अयोध्या लौट जाते हैं अयोध्या पहुंचकर भरत उनको देखकर बहुत खुश होते हैं उसके बाद गुरु वशिष्ठ राम का राजतिलक करते हैं इस तरह से प्रभु राम अयोध्या के राजा बनते हैं। अयोध्या में रामराज्य आने से सभी लोग बहुत खुश होते हैं

छोटी दीवाली यानी नरक चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है ?

पौराणिक कथाओं के मुताबिक रक्तबीज नाम का एक राक्षस था। जिसे ब्रह्मा जी ने यह वरदान दिया था कि जब भी उसके रक्त यानि खून की बूंदे जमीन पर गिरेगी उससे एक और रक्तबीज का जन्म हो जाएगा। ब्रह्म जी से ऐसा वरदान मिलने के बाद रक्तबीज बहुत खुश हो जाता है और वो अब चारों तरफ सबको परेशान करने लगता है। स्वर्ग जाकर देवी-देवताओं पर भी हमला करने लगता है। सभी देवी-देवता उससे बचने के लिए इधर-उधर भागते हुए। रक्तबीज उनके पीछे-पीछे रहता है। फिर देवी-देवता कैलाश पर्वत भोले बाबा के पास पहुंचते हैं। वहाँ पहुंचकर माता पार्वती को सब कुछ बताते हैं। देवी पार्वती रक्तबीज का सामना करने के लिए खड़ी हो जाती हैं। रक्तबीज जब देवी पार्वती को देखता है तो वो उन पर मोहित हो जाता है। देवी पार्वती रक्तबीज से वापस जाने को कहती हैं। लेकिन रक्तबीज नहीं मानता और माता पार्वती की तरफ बढ़ने लगता है। तभी देवी पार्वती को सामने रखा शिवजी का त्रिशूल दिखाई देता है।

 

वो त्रिशूल को उठा लेती हैं और रक्तबीज पर मारती हैं। त्रिशूल लगते ही रक्तबीज के शरीर से रक्त निकलने लगता है। अब क्योंकि उसे ब्रह्मा जी ने आशीर्वाद दिया था कि उसके शरीर से अगर रक्त की जितनी भी बूंदे नीचे जमीन पर गिरेंगी तो उन बूंदों से और उतने ही रक्तबीज फिर से बन कर खड़े हो जाएंगे। तो इस वजह से त्रिशूल लगने से जितनी भी उसके शरीर से खून की बूंदे गिरती हैं उतने और रक्तबीज आ जाते हैं। ऐसा देख कर माता पार्वती को बहुत गुस्सा आ जाता है। इसके बाद सारे रक्तबीज मिलकर माता पर्वती पर हमला करने लगते हैं। माता पर्वती फिर उन पर त्रिशूल चलाती हैं। जिससे पहले से भी ज्यादा रक्तबीज उनके सामने आकर खड़े हो जाते हैं। अब माता पार्वती का गुस्सा आसमान छूने लगता है। वह अपने गुस्से पर काबू ही नहीं कर पा रही थी। जब उनका गुस्सा बिल्कुल भी काबू नहीं हुआ तब उनका शरीर काला पड़ने लगा। आंखें खून से लाल हो गई और देखते ही देखते देवी ने भयंकर रूप धारण कर लिया। पूरे ब्रह्मांड में माता काली की आवाज़ गूंजने लगी। इसके बाद माता काली ने एक हाथ से रक्तबीज के सर को पकड़ा और तलवार से उसके सिर को उसके शरीर से अलग किया। और उसके सिर के नीचे एक खपर रखा ताकि एक बूंद रक्त भी धरती पर गिरे और फिर उसके बाकी शरीर को निगल गई। तो इस तरह से माता काली ने रक्तबीज का अंत किया।

 

अब क्योंकि माता काली बहुत गुस्से मे थी, जिस वजह से चारों तरफ हाहाकार मचने लगी। माता काली का गुस्सा कम ही नहीं हो रहा था। सारे देवी देवता उनके गुस्से से डरने लगे। तब भोले बाबा काली मां के सामने एक नीचे लेट गए। आगे बढ़ रही माता काली के पैर भोले बाबा के सीने पर पड़ते हैं। फिर माता की नजर जैसे ही नीचे जाती है तो वो देखती हैं कि नीचे तो भोले बाबा है। तब उन्हें ऐसा करना गलत लगता है और वो इस वजह से अपनी जीभ बाहर निकाल देती हैं। तब जाकर माता काली का गुस्सा खत्म होता है। तो बच्चों इस तरह से रक्तबीज का अंत करने के लिए माता पार्वती ने काली माँ का रूप लिया और उसे खत्म किया। यही वजह है कि हम लोग दीवाली के एक दिन पहले काली चौदस मनाते हैं। इस दिन माता काली की पूजा होती है और इस दिन को नरक चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। अब आपसे कोई भी पूछे कि छोटी दीवाली क्यों मनाते हैं तो आप झट से बता देना।।

 #Diwali 

दीवाली क्यों मनाई जाती है ?

दिवाली क्यों मनाई जाती है। बच्चों आप सभी जानते हैं कि हम लोग दीवाली कितने धूम-धाम से मनाते हैं। इस दिन हम नए कपड़ें पहनते हैं और दिया जलाते हैं। चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ होती है खुशियों कि जग-मगा-हट।  बच्चों दिवाली 5 दिनों का त्योहार है। पहला दिन धनतेरस से शुरू होता है और उसके बाद दूसरे दिन आती है छोटी दिवाली फिर तीसरे दिन दिवाली, चौथे दिन गोवर्धन पूजा और फिर पाँचवे दिन हम मनाते हैं भाई दूज। लेकिन हम दीवाली क्यों मनाते हैं..तो चलिए बताती हूँ मैं आपको...

अयोध्या के राजा दशरथ अपनी तीन रानियों कौशल्या, सुमित्रा, केकई और चारों पुत्रों राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न के साथ रहते थे। प्रभु राम सबसे बड़े थे और वो अयोध्या का हर काम भी अच्छे से संभालते थे, इसलिए राजा दशरथ उन्हें अपनी जगह अयोध्या का राजा बनाना चाहते थे। लेकिन राजा दशरथ कि तीसरी रानी केकई को ये बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगी । वो अपने बेटे भरत को प्रभु राम कि जगह अयोध्या का राजा बनाना चाहती थी। इसके लिए उन्होंने राजा दशरथ को वो 2 वरदान याद दिलाए जो उन्होंने केकई को अपनी जान बचाने के लिए दिया था। कैकई ने राजा दशरथ से प्रभु राम को 14 साल का बनवास और अपने बेटे भरत को उत्तराधिकारी बनाने को कहा। राजा दशरथ को ना चाहते हुए भी केकई की बात माननी पड़ती है। प्रभु राम अपने पिता के दिए हुए वचनों को पूरा करने के लिए अपनी पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वनवास के लिए निकल जाते है।

वन में प्रभु राम एक कुटिया बना कर माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ रहने लगे। तभी एक दिन वहाँ शूर्पनखा नाम कि राक्षसी अपना रूप बदल कर आई। वो प्रभु राम से शादी करना चाहती थी। लेकिन प्रभु राम उसे अपने भाई लक्ष्मण के पास भेज देते हैं। लक्ष्मण को गुस्सा आता है और वो उसकी नाक काट देते हैं। शूर्पनखा का भाई रावण था। रावण बहुत ताकतवर था। वो अपनी बहन शूर्पनखा का बदला लेने के लिए माता सीता को जबरदस्ती उठा लेता है और उन्हें लंका लेकर आ जाता है। इससे प्रभु राम को बहुत गुस्सा आता है और हनुमान जी कि मदद से लंका पहुंचते हैं और रावण का वध करते है। रावण के वध के बाद प्रभु राम के वनवास के 14 साल भी पूरे हो जाते हैं और फिर वो माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वापस आयोध्या आते हैं। जब प्रभु राम अयोध्या पहुंचते हैं तो पूरे अयोध्या के लोग बहुत खुश होते हैं और वो इस खुशी में चारों तरफ दिए जलाकर प्रभु राम का स्वागत करते हैं। हर तरफ सिर्फ और सिर्फ खुशियों की ही रोशनी होती है।

 

तो बच्चों इसलिए हम दीवाली मनाते हैं। बच्चों दीपावली रौशनी का त्योहार है। आपने देखा होगा कि घरों में दीपावली के दिन दीए जलाए जाते हैं, खूब रौशनी की जाती है. हर ओर आपको रोशनी ही रोशनी दिखाई देती है। इसलिए तो इसे प्रकाश पर्व भी कहते हैं।  जो हमारे अंदर के अंधकार को मिटाता है। हमारे जीवन में खुशियों की रौशनी लाता है। खील और बतासे से पूजा की जाती है। पर पता है, ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस प्रकार भुनने के बाद खील बनती है उसी तरह अगर हमारे सामने कोई परेशानी आती है तो उससे हमे घबराना नहीं है बल्कि हमे खील की तरह और खिलना है।  हमारी खिलखिलाहट में रस घोलने के लिए बतासा मिठास का प्रतीक है, तो दीए ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक होते हैं।  इतना खूबसूरत त्योहार है यह दीपावली और इस खूबसूरत दीवापली पर स्टोरी विद अन्वी की तरफ से आप सभी को ढेर सारी शुभामनाएं।  इस दीवापली आपकी सभी विश पूरी हो, यही मेरी विश है। आप सब मुस्कुराते रहें, खुश रहे।। हैप्पी दीवाली मेरे प्यारे बच्चों..

#Diwali

शाशा की जिद और पापा की सीख 

Best short moral story for kids in hindi

एक बार की बात है शशा नाम की एक छोटी सी बच्ची थी। शशा के घर में उसके मम्मी, पापा और सिर्फ वो ही रहते थे। शशा के मम्मी, पापा उसकी हर एक बात मानते थे। शशा उनसे जो कुछ भी मांगती तो वो उसे लाकर दे देते थे। शशा के कुछ दोस्त भी थे। जिनके साथ हर शाम वो गार्डन में खेलने जाती थी। ऐसे ही एक दिन शशा अपने दोस्तों के साथ गार्डन में खेलने के लिए घर से निकल रही थी। तभी उसकी मम्मी उससे कहती है अरे शशा, घड़ी यहीं उतार के जा बेटा। खेल-खेल में कहीं घड़ी गिर गई तो। लेकिन शशा अपनी मम्मी की बात नहीं मानती और उनसे कहती है अरे मम्मा आप परेशान ना हो। मैं संभाल कर रखूंगी इस घड़ी को। और ऐसा बोलते हुए शशा खेलने के पार्क पहुँचती है। कि तभी उसकी एक दोस्त चीना की नजर शशा के हाथ में जाती हैं। वो दौड़ते हुए शशा के पास पहुँचती है और उससे बोलती है। अरे वाह शशा.. तुम्हारी घड़ी तो बहुत सुंदर लग रही है.. अरे चिंटू, मिनटु तुम सब भी जल्दी आओ। देखो शशा ने कितनी सुंदर घड़ी पहन रखी है और फिर चीना की ये बात सुनकर सारे दोस्त शशा को घेर कर खड़े हो जाते हैं और उसकी घड़ी देखने लगते हैं। तभी शशा उनसे कहती है। अरे-अरे दूर हटो.. मेरी घड़ी को कोई मत छूना । कहीं खराब हो गई तो.. शशा इतना बोल ही रही थी कि तभी मिनटु उसकी घड़ी को ज़ोर से पकड़ता है और उसके हाथ से निकलने लगता है..एक तरफ शशा अपना हाथ खिचती है तो दूसरी तरफ मिनटु..और इस खिचतान में शशा की घड़ी उसके हाथ से निकल जाती है और कहीं दूर जाकर गिर जाती है। ये सब देख कर शशा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती है..और इधर शशा का रोना देख उसके सभी दोस्त वहाँ से ज़ोर से भागते हैं और फिर शशा रोते-रोते अपने घर पहुँचती है।

 

शशा को रोता देख उसकी मम्मी उससे पूछती है, क्या हुआ शशा.. तुम रो क्यों रही हो। फिर शशा उन्हें सारी बात बताती है। शशा की बात सुन कर मम्मी उससे कहती है, देखा शशा मैंने कहा था ना कि घड़ी पहन कर बाहर मत जा। लेकिन तुमने मेरी बात नहीं मानी और अब देखो क्या हुआ। मम्मी की बात सुन कर शशा उनसे सॉरी बोलती है और अपने कमरे में चली जाती है। फिर इस बात को तो कई दिन बीत जाते हैं लेकिन शशा  की उदासी नहीं जाती। उसे बार-बार अपनी घड़ी की याद आती। इस वजह से उसने अब बाहर जाकर खेलना भी बंद कर दिया था। बस वो घर में उदास होकर रहने लगी। तभी एक दिन उसके पापा उसके पास गए और उससे बोले..क्या हुआ शशा।। कई दिनों से देख रहा हूँ बेटा तुम बहुत उदास रहती हो। कोई बात हुई क्या बेटा। फिर शशा अपने पापा को पूरी बात बताती है। शशा की बात सुन कर उसके पापा उससे कहते हैं हाँ शशा गलती तो की तुमने।। लेकिन पता है बेटा, तुमने एक नहीं दो-दो गलतियाँ की हैं। दो गलतियाँ.. नहीं पापा मैंने तो एक ही गलती की है.. वो यह कि मैंने मम्मी की बात नहीं मानी और अपनी प्यारी घड़ी को पहन कर बाहर चली गई खेलने। तभी उसके पापा कहते हैं हाँ शशा ये तो हुई तुम्हारी पहली गलती लेकिन दूसरी गलती तुम अब कर रही हो.. ऐसे उदास होकर। बेटा अगर कोई बड़ा आपको किसी काम को करने से मना करें तो उस काम को बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए और मान लो कि तुमने कुछ गलती कर भी दी तो उसके लिए सॉरी बोलना चाहिए और दोबारा वो गलती ना हो ऐसा खुद से प्रामिस करना चाहिए.. तभी शशा अपने पापा से कहती है पापा दूसरी गलती, वो क्या की मैंने। पापा कहते हैं बेटा तुम्हारी दूसरी गलती तुम्हारा इस तरह से उदास रहना है। अब देखो गलती तो हो गई है, लेकिन उसके लिए उदास हो कर अपना आने वाला समय बर्बाद करना दूसरी गलती होगी। है ना शशा। हमें हमेशा अपनी गलतियों से सीखते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। समझी मेरी छोटी सी शशा। पापा की बात सुन कर शशा तुरंत मुसकुराती है और अपने पापा के गले लग जाती है। तभी उसकी मम्मी वहाँ आती हैं और वो शशा को एक गिफ्ट देती हैं। शशा झट से उस गिफ्ट को खोलती है तो उसे पहले वाली घड़ी से भी सुंदर घड़ी मिलती है। जिसे देख कर शशा बहुत-बहुत खुश हो जाती है और कहती है पापा-मम्मी अब मैं हमेशा आपकी बात मानूँगी।

moral of the story : तो बच्चों इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि हमें हमेशा अपने बड़ों की बात माननी चाहिए और किसी खोई चीज़ के लिए उदास भी नहीं होना चाहिए। समझे।   

चंपा लोमड़ी का गुस्सा और मॉन्टी बंदर

Best Short Moral Story for Kids

एक बार की बात है ढोलकपुर जंगल में चम्पा लोमड़ी को लेकर बड़ी हलचल थी। जिसको देखो बस वही चम्पा की बातें कर रहा था। इन्हीं सब के बीच कू-कू कोयल और गज्जू हाथी भी आपस में बात कर रहे थे। कू-कू कोयल गज्जू हाथी से कहती है गज्जू दादा सुना आपने अपनी चंपा के बारे में। क्या बताऊँ..पता नहीं क्या हो गया है चंपा लोमड़ी को। कितना गुस्सा करने लगी हो वो। कू-कू कोयल की बात सुन कर गज्जू हाथी उससे कहता है.. हाँ कू-कू कोयल, पता नहीं क्या हो गया है आज कल चम्पा रानी को। अब तो छोटी-छोटी बातों पर भी गुस्सा करने लगी है। कल ही की बात है चंपू गधा उसके बगीचे के बाहर बस निकल ही रहा थी कि चम्पा ने उसे देख लिया .. और वो उसके पीछे गुस्से में चिल्लाते हुए दौड़ने लगी। बैचरा चंपू गधा, एक तो वो पहले से ही गधा है अब इतनी तेज दौड़े कैसे, लेकिन चंपा के गुस्से से बचने के लिए उसे तेजी से दौड़ना पड़ा अब बैचरा अपने घर में बैठा है। डर से वो अपने घर से भी नहीं निकल रहा। पता नहीं क्या हो गया आज कल चंपा रानी को। गज्जू हाथी इतना बोल ही रहा था कि वहाँ सुंदर सा मुकुट पहने मॉन्टी बंदर आता है। उसके साथ ओर भी कई बंदर रहते हैं। इतने सारे बंदर को देख कर कू-कू कोयल तुरंत कहती है..

 

अरे मॉन्टी बंदर इतना सुंदर मुकुट पहन कर और अपने साथ इतने सारे बंदरों को लेकर कहाँ चले। क्या तुमको चम्पा लोमड़ी के गुस्से के बारे में नहीं पता। भूल कर भी उसके बगीचे की तरफ मत जाना। तभी मॉन्टी बंदर कहता है।। हा हा कू-कू कोयल। मैं हूँ बंदरों का राजा मॉन्टी। पहनता हूँ मुकुट और करता हूँ अपने मन की और ये कौन है चंपा लोमड़ी.. हा हा। मजाक कर रहा थ कू-कू कोयल। हाँ मुझे भी पता चला है कि आज-कल चंपा लोमड़ी को बहुत गुस्सा आने लगा है। उसके डर की वजह से को भी अपने घर से नहीं निकल रहा। सोचा चंपा को कुछ मज़ा चखाया जाए बस यही सोच कर आया हूँ और अब जा रहा हूँ उसके बगीचे में। तभी गज्जू हाथी बोलता है, अरे नहीं मॉन्टी बंदर। चम्पा लोमड़ी तुमको छोड़ेगी नहीं। मेरी तो यही सलाह है उससे दूर रहो। लेकिन मॉन्टी बंदर गज्जू हाथी की बात नहीं मानता और चंपा लोमड़ी के बगीचे पहुँच जाता है। वहाँ पहुँच कर सारे बंदर मिलकर केला खाने लगते हैं। तभी चंपा को इन सबकी आवाज सुनाई देती है और वो भागते हुए अपने बगीचे में पहुँचती है। इतने सारे बंदरों को देख कर वो उन पर ज़ोर-ज़ोर से गुस्सा करने लगती है। चंपा लोमड़ी के गुस्से से सारे बंदर बहुत डर जाते हैं और वो वहाँ से बाहर की तरफ निकल जाते हैं। लेकिन मॉन्टी बंदर बगीचे में ही पेड़ के ऊपर रहता है। उसे देख कर चंपा लोमड़ी कहती है..

 

अरे मॉन्टी बंदर तुमको मुझसे डर नहीं लगता। सारे ढोलकपुर के जानवर मुझसे डरते हैं। यहाँ तक कि रुस्तम शेर भी अब मेरे पास आने से डरता  है। सबको मेरा गुस्सा पता है। लेकिन तुम।। रुको अभी, आती हूँ तुम्हें सबक सीखने और ऐसा बोलते हुए चंपा लोमड़ी गुस्से में उसके पास जाती है। चंपा लोमड़ी को अपने पास आता देख मॉन्टी बंदर एक पेड़ से दूसरे पेड़ भागने लगता है। आगे-आगे मॉन्टी बंदर और पीछे-पीछे चंपा लोमड़ी रहती है। दोनों तेज-तेज एक दूसरे के आगे-पीछे भागने लगते हैं। तभी भागते-भागते चंपा लोमड़ी का पैर फिसलता है और वो नीचे गिर जाती है। नीचे होती है गीली मिट्टी और फिर चंपा लोमड़ी के पूरे शरीर में लग जाता है कीचड़। अपने शरीर और चेहरे पर कीचड़ लगने से चंपा कुछ देर के लिए ऐसे ही खड़ी रह जाती है और मॉन्टी बंदर भी एक दम चुप होकर एक जगह बैठ जाता है। मॉन्टी बंदर को अब सच में चम्पा लोमड़ी से डर लगने लगता है। तभी चम्पा लोमड़ी ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगती है। उसको अपना शरीर देख कर बहुत हंसी आती है। चंपा लोमड़ी को हँसता देख मॉन्टी बंदर भी ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगता है और उसके पास पहुंचता है। चम्पा लोमड़ी इतने ज़ोर से हँसती है कि पूरे ढोलकपुर में उसकी आवाज सुनाई देती है। फिर सारे जानवर उसके पास पहुंचते हैं और उसकी हंसी सुन कर वो भी हंसने लगते हैं। तभी चंपा लोमड़ी सभी जानवर से कहती है मुझे माफ कर दो आप सब। मैंने आप सब को अपने गुस्से की वजह से बहुत परेशान कर दिया था। लेकिन अब मुझे हंस कर बहुत अच्छा लग रहा। शुक्रिया मॉन्टी बंदर। जाओ तुम्हें जितने केले खाने है खालों.. उसके बाद मॉन्टी बंदर मन भर कर केले खाता है।

 

Moral of the story : हमें हमेशा हँसते-मुस्कुराते रहना चाहिए। गुस्सा करने से बचना चाहिए।

छठ पूजा की कहानी 

Short Moral story for kids in hindi

बच्चों आज मैं आपको सुनाने जा रही एक ऐसे एक ऐसी पूजा, ऐसे व्रत के बारे में बताने जा रही हूँ जिसकी बहुत मान्यता है। आप चाहे देश में हो या विदेश में, हर जगह इस पूजा का बड़े उत्साह बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। बच्चों इस पूजा का नाम है छठ पूजा। बच्चों छठ पूजा चार दिनों की होती है। पहले दिन नहाय खाय होता है, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन व्रत करने वाले शाम को ढलते सूर्य भगवान को अर्ध्य देते हैं, अर्ध्य का मतलब पता है आपको? अर्ध्य का मतलब है जल चढ़ाकर नमन करना और फिर चौथे दिन उगते सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है और इसी के साथ छठ संपन्न होता है. पता है बच्चों इस पर्व महापर्व कहा जाता है, क्योंकि इस पर्व में सब एक बराबर होते हैं. कोई छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब नहीं होता. सब मिल कर प्रकृति की पूजा करते हैं. आपमे से कई बच्चों के घर ये पूजा हो भी रही होगी। बच्चों क्या है छठ पूजा, क्यों मनाया जाता है इसे.. क्या पता है आपको, नहीं पता तो मैं आपको बताती हूँ।

एक प्रियव्रत नाम के राजा थे। उनकी पत्नी भी थी। जिनका नाम मालिनी था। राजा और रानी दोनों एक बात को लेकर बहुत परेशान रहते थे। और वो बात थी उनके पास एक भी संतान का ना होना। राजा और रानी संतान ना होने की वजह से बहुत दुखी रहते थे। तभी एक दिन राजा को महा ऋषि कश्यप मिले। उन्होंने राजा से संतान के लिए यज्ञ करने को कहा। संतान यानि बच्चा पाने के लिए राजा प्रियव्रत महा ऋषि कश्यप की बात मान जाते हैं और यज्ञ करवाते हैं। यज्ञ करवाने के बाद राजा और रानी को बेटा होता है लेकिन बेटा जिंदा नहीं होता है। यानी उसकी साँसे नहीं चल रही थी। ये सब देखकर राजा बहुत दुखी हो जाता। और वो अब खुद को खत्म करने के बारे में सोचने लगता है। उसे लगता है कि अब उसका जिंदा रहने का कोई फायदा नहीं है। बस यही सोच कर वो अपने आप को खत्म करने जा ही रहा था कि तभी उसके सामने एक देवी आती हैं। देवी राजा से कहतीं हैं कि मैं षष्ठी देवी हूँ। जो भी मेरी पूजा सच्चे मन से करता है उसको मैं पुत्र प्राप्त होने का आशीर्वाद देती हूँ साथ ही मैं सबकी मनोकामना भी पूरी करती हूँ। देवी राजा से कहती हैं अगर तुम मेरी पूजा सच्चे मन से करोगे तो मैं तुम्हारे दुख को दूर करूंगी। तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी। राजा देवी की बात मान जाता है और फिर वो और उसकी पत्नी कार्तिक शुक्ल की षष्टि तिथि के दिन षष्टि देवी की पूरे विधि-विधान से पूजा करते हैं और फिर कुछ समय के बाद उन दोनों को बहुत ही सुंदर पुत्र प्राप्त होता है। और फिर तभी से छठ पर्व मनाए जाने लगा।

बच्चों इस व्रत को लेकर एक ओर मान्यता है है। वो ये कि जब महाभारत में पांडव अपना सब कुछ जुए में हार जाते हैं तब द्रोपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से द्रोपदी की मनोकामना पूरी होती है और पांडव को फिर से राजपाट वापस मिल जाता है।

कौन है छठी मैया-

बच्चों छठ पूजा में सबसे पहले ढलते और उसके बाद उगते सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है और छठी माता की पूजा की जाता है। बच्चों वेदों के अनुसार छठी मैया को उषा देवी भी कहते हैं और देवी उषा सूर्य भगवान की बहन हैं। उषा देवी की पूजा करने से और उनके गीत गाने से सूर्य भगवान प्रसन्न होते हैं और सभी की मनोकामनाए पूरी करते हैं।